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जैन मंदिर

जैन मंदिर

काल और स्‍थान, दोनों दृष्टिकोण से हिन्दू मंदिरों के समूह से पृथक् यह जैन मंदिर जिसे स्‍थानीय रूप से जैन नारायण कहा जाता है , 9वीं शताब्‍दी ई. में संभवत : राष्‍ट्रकूट वंश के राजा कृष्णा-।। के शासन काल में बनवाया गया था। यह तिमंजिला मंदिर जिसकी निचली दो मंजिलें प्रयोग में हैं, पट्टदकल की मंदिर -श्रृंखला का अंतिम मंदिर है। इस मंदिर में प्रदर्शित कतिपय विशेषताएं समय के साथ -साथ कल्‍याणी चालुक्‍यों के मंदिरों की अनिवार्य विशेषताएं बन गईं थी।

योजना में यह मंदिर एक वर्गाकार गर्भगृह है जिसके चारों ओर प्रदक्षिणापथ है जिसकी दीवारें गिर चुकी हैं। इसमें एक उपकक्ष (अंतराल), एक हॉल (मंडप) और एक मुखमंडप है। यह तिहरी ढ़लाई वाली प्लिंथ पर टिका है जिसमें प्रक्षेप और आले हैं। गर्भगृह की दीवारों (जो अब देखी जा सकती हैं) में थोड़ा सा केंद्रीय प्रक्षेपण (भद्र) और पतली चतुष्‍कोणीय भित्‍ति-स्‍तंभों की पंक्ति दिखाई देती है। मंडप की उत्‍तरी और दक्षिणी दीवारें सात खांचों में विभक्‍त हैं। इन खांचों के बीच आलों में संकीर्ण आले हैं जो उभारदार चापित विवरों (नासिका) से अलंकृत हैं जिनमें जगह -जगह अधिष्टित जिन और अन्‍य मूर्तियां है। इन दीवारों के ऊपर कुट (वर्ग), साल (अंडाकार) और पंजर (लघु मंदिर नमूने) कहे जाने वाले स्‍थापत्‍य कला के तत्‍वों की एक शृंखला सुशोभित है। छत के पानी की निकासी के लिए छत के स्‍तर के ठीक नीचे खांचों (सलिलांतरों) में जल प्रणालों की व्‍यवस्‍था की गई है।

ऊपरी मंदिर की दीवारें भूतल की दीवारों के कम होते हुए स्‍तर विन्यास को दर्शाती हैं। इसके अतंराल का अग्रभाग शुकनासा प्रक्षेप के आधारिक भाग द्वारा आच्‍छादित है जबकि अन्य तीन तरफ की प्राकार पर कर्णकुट और साल हैं। कम चौड़ाई वाली तीसरी मंजिल पर अग्रभाग को छोड़कर , पार्श्वों पर उभार हैं। आलों में कुडु जैसी चापें और अर्धचापें हैं जैसी कि उत्‍तरी शैली के मंदिरों में देखने को मिलती है। इस मंजिल के उपर दबा हुआ ग्रीवा आला सुंदर रूप से उकेरे गए वर्गाकार शिखर को सहारा देता है।

खुले मुखमंडप में कक्षासन से जुड़े हुए स्‍तंभों की परिधीय पंक्तियां हैं। ये सभी स्‍तंभ, हॉल के साथ सटे हुए दो और केंद्र में स्थित चार को छोड़कर, यद्यपि बलुआ पत्‍थरों से निर्मित हैं, अंशत: खरादे गए हैं। कक्षासन का बाह्य भाग पूर्ण -घट निधियों , व्यालों, नर्तकियों आदि की नक्काशीदार मूर्तियों से अलंकृत है जो आंशिक रूप से परिष्कृत हैं। हॉल की दीवार पर मुखमंडप के अन्‍दर दरवाजे के दोनों ओर हाथियों की विशाल मूर्तियां हैं जिन पर सवार मौजूद हैं।

हॉल की चौखट छह शाखाओं से अलंकृत है जिसके नीचे शंखनिधि , पद्मनिधि और पूर्णघट हैं। हॉल और अंतराल में विशालाकार स्‍तंभ हैं। गर्भगृह की चौखट में पाँच शाखाएं हैं जिनमें दोनों ओर सुंदर स्‍तंभिका एक सुंदर पुष्‍पसज्‍जित पूंछ वाले मगरमच्‍छ (मकर) को सहारा देती है।

प्लिंथ के कपोत स्‍तर पर और दीवार के कपोत पर कुडु मूल भाव अपनी मूल आकृति खो चुके हैं और चपटी त्रिकोणीय आकृतियां बन गए हैं। स्‍ंतभों के शीर्ष भी अपनी मूलाकृति और गठीलापन खो चुके हैं और मात्र पारंपरिक आकृतियों में परिवर्तित हो गए हैं। इसी प्रकार अपने अंतर्लम्‍बों (आफ़सेट) सहित वर्गाकार शिखर, बारह बत्तों (रिब) वाले घटक का रूप ले चुका है। जो भी सुधार किए गए हैं वे उत्‍तरवर्ती चालुक्‍य मंदिरों की विशेषताएं हैं जिनका प्रादुर्भाव परवर्ती शताब्‍दियों में हुआ।

भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण द्वारा मंदिर परिसर में किये गए उत्‍खनन से ईटों से निर्मित विशाल मंदिर परिसर और सम -भंग मुद्रा में खड़े तीर्थंकर की सुंदर मूर्ति के अवशेष सामने आए हैं जो एक ऐसे मंदिर के अस्‍तित्‍व को इंगित करते हैं जो चालुक्‍य शासन काल से पूर्व का या उसके आंरभिक काल का रहा होगा।

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