"All Centrally Protected Monuments & Museums of ASI will remain closed till 31.05.2021 or until further orders due to COVID situation."

मौर्यकालीन सभागार स्थल, कुम्रहार

hdr_mahabodhi

मौर्यकालीन सभागार स्थल, कुम्रहार

प्राचीन पाटलिपुत्र के पुरतात्त्विक अवशेष अर्थात अस्सी स्तंभों वाला हॉल और अरोग्य विहार, पटना रेलवे स्टेशन से लगभग 6 कि.मी. पूर्व में कुम्रहार में स्थित हैं।

प्राचीन साहित्य में पाटलिपुत्र के विभिन्न नामों का उल्लेख मिलता है- जैसे पाटलिग्राम, पाटलिपुरा, कुसुमपुरा, पुष्पपुरा या कुसुमध्वज। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यह एक छोटा गांव था जहां महात्मा बुद्घ ने अपने महापरिनिर्वाण से कुछ पहले वैशाली के लिच्छवी गणराज्य से मगध राज्य की रक्षा के लिए राजगृह के राजा, अजातशत्रु के आदेश से बनाए जा रहे किले को देखा था। अजातशत्रु का पुत्र और उत्तराधिकारी, राजा उदयिन इस स्थान की सामरिक स्थिति से बहुत प्रभावित हुआ। उसने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य में मगध की राजधानी राजगृह के स्थान पर पाटलिपुत्र को बनाया। लगभग अगले एक हजार वर्षों तक पाटलिपुत्र शिशुनाग, नंद, मौर्य, शुंग और गुप्त राजवंशों के महान भारतीय सम्राटों की राजधानी बना रहा। यह स्थान शिक्षा, वाणिज्य, कला और धर्मिक क्षेत्रों संबंधी कार्यकलापों का मुख्य केन्द्र रहा। सम्राट अशोक के काल में तृतीय बौद्घ सभा यहां पर आयोजित हुई थी। इसी प्रकार, महान जैन तपस्वी, स्थूलभद्र ने चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में यहां एक सभा का आयोजन किया था।

नगर प्रशासन सहित पाटलिपुत्र का पहला विशद वृतांत लगभग 300 ई.पूर्व चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार के महान यूनानी राजदूत, मेगस्थनीज से मिलता है जिसने अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में पालीबोथरा के रूप में इसका उल्लेख किया है। उसके इस वृतांत के अनुसार यह नगर गंगा नदी के साथ-साथ पूर्व-पश्चिम में लगभग 14 कि.मी. तक और उत्तर-दक्षिण में 3 कि.मी. तक समानान्तर चतुर्भुज के समान फैला था। इस नगर का घेरा लगभग 36 कि.मी. था। इस नगर को काष्ठ की एक विशाल प्राचीर द्वारा घेरा गया था। इसके अतिरिक्त, इसकी रक्षा के लिए एक चौड़ी-गहरी खाई भी थी जो नगर के सीवर के रूप में उपयोग में लायी जा रही थी। कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में भी इस नगर के चारों ओर बनी चाहरदीवारी का उल्लेख किया है। लोहानीपुर, बहादुरपुर, संदलपुर, बुलंदीबाग, कुम्रहार और पटना के कुछ अन्य स्थानों के उत्खनन की श्रृंखला में काष्ठ की प्राचीर के अवशेष पाए गए हैं।

कुम्रहार में मौर्यकालीन स्तंभ वाला सभागार स्थल, श्री रतन टाटा द्वारा दी गई निधि से डी.बी. स्पूनर के अधीन वर्ष 1912-15 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए उत्खनन से प्रकाश में आया। इस उत्खनन में 72 स्तंभों के अवशेष पाए गए थे। इसके अतिरिक्त, सन 1951-55 में के.पी. जायसवाल अनुसंधान संस्थान, पटना द्वारा किए गए उत्खनन में सभागार के आठ और स्तंभ तथा चार अतिरिक्त स्तंभ प्राप्त हुए जो प्रवेश द्वारमंडप से संबंधित हैं। इसके बाद से यह ‘अस्सी स्तंभ वाले सभागार के रूप में प्रसिद्घ हुआ।

सभी स्तंभ काले चकतों वाले पांडु बलुआ एकाश्मक प्रस्तर से बने थे जिन पर मौर्य काल की विशेष चमक देखने को मिलती है।

इस हॉल के संबंध में कहा जाता है कि इसका विभिन्न रूपों में इस्तेमाल किया जाता था- जैसे सम्राट अशोक का महल, दर्शकों के लिए हॉल, मौर्यों का सिंहासन कक्ष, विहार हॉल या अशोक के शासन काल में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुई तीसरी बौद्घ सभा के लिए सम्मेलन हॉल।

के.पी. जायसवाल अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गए उत्खनन से गुप्त काल की ईंटों से बनी संरचना निकाली गई जिसकी पहचान उस स्थान से प्राप्त उत्कीर्णित टेराकोटा मुद्रांक के आधार पर अरोग्य विहार या अस्पताल एवं महाविहार के रूप में की गई है। इस मुद्रांक पर ‘श्री अरोग्य विहार भिक्षुसंघस्या’ लिखा हुआ है। एक अन्य छोटा लाल ठीकरा भी प्राप्त हुआ है जिस पर ‘धनवंतरे’ शब्द लिखा हुआ है जो संभवत: आरोग्य विहार के प्रमुख वैद्य का नाम या उपाधि है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह अस्पताल गुप्त काल के प्रसिद्घ वैद्य धनवन्तरी द्वारा चलाया जाता था।

इस क्षेत्र के उत्खनन से प्राप्त महत्वपूर्ण वस्तुओं में तांबे के सिक्के, आभूषण, अंजन शलाकाएं, टेराकोटा और पत्थर के मनके, टेराकोटा और हाथी दांत के पासे, टेराकोटा मुहरें और मुद्रांक, खिलौना-गाड़ियाँ, त्वचामार्जक, मानव, पक्षी और पशुओं की लघु मृणमूर्तियाँ और कुछ मिट्टी के बर्तन शामिल हैं। यात्रियों की सुविधा के लिए स्थल प्रदर्शनी कक्ष में रखे पुरावशेषों, फोटोग्राफों, लिप्यंतरणों, डायोरामा और अन्य चित्रों के माध्यम से कुम्रहार के विषय में जानकारी मिलती है।

स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला है।

प्रवेश शुल्क: भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 15/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य- 200/- रूपए प्रति व्यक्ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

Facebook Twitter