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भीम बेटका शैलाश्रय-अधिक जानकारी

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विश्व विरासत स्थल-भीम बेटका के प्रागैतिहासिक शैलाश्रय-अधिक जानकारी

भीम बेटका की अव्‍यवस्‍थित गुफाएं ( 2405 उत्‍तर और 76045 ’ पूर्व) मध्‍य प्रदेश राज्‍य की राजधानी भोपाल से लगभग 45 कि.मी. उत्‍तर -पूर्व में स्‍थित हैं। भोपाल- हौशंगाबाद राजमार्ग के साथ -साथ स्‍थित ये गुफाएं रायसेन जिले में भियापुर गॉंव के निकट स्‍थित हैं। प्राचीन विंध्‍याचल पर्वतमाला के उत्‍तरी किनारे पर उत्कृष्ट शैलाश्रयों और चित्रों का स्‍थल है। इसकी विस्‍मयकारी चट्टानें प्राचीन खजाने की अपने भीतर ही किलेबंदी कर लेती हैं। घने जंगलों में अत्यधिक हरियाली , चट्टानी भूभागों और पथरीली चोटियों के बीच छिपी तथा प्राचीन परिसरों की रक्षा करती ऊंची चट्टानों के बीच स्‍थित भीमबेटका की गुफाएं भीमबेटका के पास एक छोटे से कस्बे- औबेदुल्‍लागंज जैसी सुदूर जगह से भी एक विस्‍मयकारी दृश्‍य प्रस्‍तुत करती हैं।

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नामकरण

भीमबेटका का नाम विश्‍व के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के पात्रों के नाम पर पडा है। ऐसा माना जाता है कि जब पाँच भाई (पांच पांडव) अपने राज्‍य से निर्वासित किए गए थे तो वे यहां आये थे और इन गुफाओं में रहे थे। बड़ी बड़ी चट्टानें दूसरे पांडव-भीम के विशालाकाय शरीर के अनुरुप बैठने की जगह हैं। इस सिद्धांत के समर्थन में एक अन्‍य प्रमाण यह दिया जाता है कि इन गुफाओं के आसपास के स्‍थानों के नाम भी पांडवों के नाम से मिलते -जुलते हैं। एक गांव, पांडापुर के नाम से जाना जाता है जबकि भिंयापुरा भीमपुरा का ही विकृत रूप माना जाता है। जहां तक आसपास के लखाजुहार वन का संबंध है , यह कहा जाता है कि यह पांडवों का महल था जो लाख से बना था। तथापि इन दावों की सत्‍यता को अभी भी ठोस प्रमाणों द्वारा पुष्‍ट किया जाना है।

खोज

भीमबेटका गुफाओं की खोज इतिहास की महान घटनाओं में से एक घटना के कारण 1957-5-8 में हुई। विक्रम विश्‍वविद्यालय , उज्‍जैन के एक साहसी पुरातत्‍ववेता डा॰ विष्‍णु वाकणकर परंपरागत मार्ग से बहुत दूर भटक कर इस प्रागैतिहासिक खजाने के बीच में पहुंच गए। यथोचित समय में हुए उत्‍खननों से पूर्व-पुरापाषाण काल से लेकर आरंभिक मध्‍ययुगीन काल तक के अवशेष प्राप्‍त हुए।

शैल कला

भीमबेटका एक प्राकृतिक कला वीथी है और एक पुरातत्त्वीय खजाना है। यहां कई मीलों तक प्रागैतिहासिक मानव के पदचिह्न समय की रेत पर आसानी से पहचाने जा सकते हैं क्‍योंकि यहां लगभग 15000 वर्ष पूर्व मनुष्‍य द्वारा रचित शैल चित्र गुफाओं में अपनी पूर्ण विविधता और सर्वतोदर्शी ब्‍योरों सहित संगृहीत हैं।
शैल चित्रों में असंख्‍य परतें हैं जो उत्तर पुरापाषण, मध्‍य पाषाण काल से लेकर पूर्व ऐतिहासिक काल , आद्य ऐतिहासिक काल और मध्‍ययुगीन काल की विभिन्‍न कालावधियों से संबंधित हैं। ऐसा माना जाता हैं कि यहां के सर्वाधिक प्राचीन दृश्‍य मध्‍यपाषाण काल से उभयनिष्‍ठ रूप से संबंधित हैं। ये उत्‍कृष्‍ट चित्र दुरूह ऊंचाइयों पर बने शैलाश्रयों की छत में भी देखे जा सकते हैं।
घने वन और वनस्‍पति के आच्‍छादन से सुरक्षित ये शैल चित्र प्राचीन काल की दिन-प्रतिदिन की घटनाओं से लिए गए विषयों को लेकर मुख्यत: लाल और सफेद रंग और अंशत: हरे और पीले रंग में से बनाए गए थे जिनमें आम तौर पर शिकार खेलने, नृत्‍य , घुड़सवारों और हाथी सवारों , पशुओं की लडा़इयों, मधु संग्रहण, शरीर-सज्जा, छद्मवेश , मुखौटों तथा विभिन्‍न प्रकार के जानवरों आदि का चित्रण है। इन चित्रों में उस समय के सामाजिक जीवन का ब्‍यौरा चित्रित है जब दीर्घ समय तक मनुष्‍य इन शैलाश्रमों में प्राय : आश्रय लेता था।
पहाड़ी भैंसे , बाघ , गैंड़े , जंगली सुअर , हाथी , बंदर , बारहसिंगों, छिपकलियों, मोर आदि जैसे जानवर शैलाश्रयों में प्रचुरता से चित्रित किए गए हैं। लोकप्रिय धार्मिक और आनुष्‍ठानिक प्रतीक भी यहां प्राय: मिल जाते हैं। गुफावासियों द्वारा मैंगनीज , हेमाटाइट , मुलायम लाल पत्‍थर और काष्‍ठ कोयले को मिलाकर तैयार किए गए रंगों का प्रयोग किया गया। शायद पशुओं की वसा और पत्‍तियों के रस का भी इस मिश्रण में प्रयोग किया गया था।
भीमबेटका की शैल कला को शैली और विषय के आधार पर विभिन्‍न समूहों में बांटा गया है। चित्रों का अधिरोपण यह दर्शाता है कि विभिन्‍न कालों में विभिन्‍न लोगों द्वारा एक ही कैनवास का प्रयोग किया गया। चित्राकंनों और चित्रों को सात भिन्‍न-भिन्‍न कालों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

काल I (पूर्व-पुरापाषाण)

ये छड़ी जैसी मानव आकृतियों के अलावा, भैंसे और सूअर जैसे जंगली जानवरों की हरे और गहरे लाल रंग से बने रेखीय चित्र हैं।
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मोरनवाली , भीमबेटका में हरे चित्र।

काल ।। (मध्‍य पाषाण)

आकार में अपेक्षाकृत छोटे इस समूह के रूढ़ शैली में बने चित्र शरीर पर रेखीय अलंकरण दर्शाते हैं। पशुओं के अलावा मानवाकृतियां और शिकार के दृश्‍य हैं जो उस समय प्रयुक्‍त होने वाले हाथियारों का स्‍पष्‍ट चित्र प्रस्‍तुत करते हैं। इन हथियारों में कांटेदार भाले , नुकीली छड़ियां , तीर -कमान शामिल हैं। सामुदायिक नृत्‍यों , पक्षियों , मां और बच्‍चों, गर्भवती महिलाओं , मृत पशुओं को ढ़ोते पुरूषों , मदिरापान आदि के दृश्‍यों
का चित्रण इस शैलाश्रय में देखने को मिलता है।

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पौराणिक वराह , मोरनवाली , भीमबेटका

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जू -रॉक , भीमबेटका में शैल -चित्र

काल III (ताम्र -प्रस्‍तरकाल)

ताम्र-प्रस्‍तरकालीन मृद्भांडों की चित्रकारी की भांति यह चित्रांकन भी मालवा के मैदानी इलाकों के कृषि समुदायों के साथ इस क्षेत्र के गुफावासियों के संबंध , संपर्क और आवश्‍यकताओं के आपसी लेन-देन को दर्शाते हैं।

काल IV (आद्य ऐतिहासिक)

इस समूह की आकृतियों की एक योजनाबद्ध और आलंकारिक शैली है और ये आकृतियां मुख्‍यत: लाल , सफेद और बहुत ही कम , हरे रंग से रंगी गई हैं और इनमें सवारों , धार्मिक प्रतीकों , टयूनिक जैसे वस्‍त्रों और विभिन्‍न अवधियों की लिपियों को चित्रित किया गया है।

काल IV (मध्य युगीन)

ये चित्र ज्‍यामितिक , रेखीय और अधिक योजनाबद्ध हैं लेकिन अपनी कलात्‍मक शैली में ये अपभ्रंश व अपरिपक्‍वता दिखाई देते हैं। यहां इन शैलाश्रयों में पहली बार गणेश और नटराज जैसे ब्राह्मणी देवताओं के चित्र देखने को मिलते हैं।
अत: इन अतिविशिष्‍ट शैलाश्रयों की छतों के ढलवां पृष्‍ठ पर कई दृश्‍य जो इन चित्रों में समाकलित हैं उस अवधि से लेकर जब मनुष्‍य एक शिकारी और संग्राहक था और उस समय तक की लम्‍बी अवधि के है जब लौह प्रौद्यौगिकी महत्‍व प्राप्‍त कर चुकी थी। इन चित्रों के अध्‍ययन से प्रागैतिहासिक काल के मनुष्‍य के कार्यों , उसके वस्‍त्रों , पशुओं और तत्‍समय की रोजमर्रा की जिंदगी के अन्‍य अनेक पहलुओं की दुर्लभ झलक देखने को मिलती है। भीमबेटका की यात्रा अतीत की यात्रा करने के समान है जहां हजारों वर्ष पूर्व इन गुफाओं में वास करने वाले मनुष्‍य के मानस और कार्यों की आश्‍चर्यजनक रूप से सूक्ष्‍म जानकारी प्राप्‍त होती है। भीमबैटका के चित्र प्रागैतिहासिक मनुष्‍य की खानाबदोश जीवन-शैली से लेकर एक जगह टिक कर रहने की कृषि -जीवन शैली मैदानी भागों में रहने वाले समुदायों के साथ उसके संबंध और अनगढ़ जीवनशैली में क्रमिक परिवर्तन व अनुकूलनशीलता , और इससे भी ज्‍यादा को जींवत रूप में चित्रित करते हैं। ये गुफाएं उस शैली के विकास के सजीव प्रलेखीकरण को निरूपित करती हैं जो चट्टानों पर अंकित असंख्य चित्रों में दिखती है। ये चित्र रेखीय प्रतिरूपण की अवस्‍था से विकसित होकर अधिक परिष्‍कृत आकृतियों में परिवर्तित होकर विविध रूपों और छवियों को चित्रित करते हैं।

अन्‍य अवशेष

भीमबेटका केवल अपनी गुफाओं और शैल चित्रों के कारण ही आश्‍चर्यचकित नहीं करता। वास्‍तव में यहां अन्‍य असंख्‍य पुरातात्विक अभिलेख हैं जिनकी खुदाई की गई है और जिनकी पुरातत्‍वविदों और पर्यटकों , दोनों ने प्रसन्‍न मन से प्रशंसा की है। भीमबेटका की यात्रा अतीत की यात्रा है और अधिक समझबूझ वाले आगंतुक को एक अपूर्व अनुभव का अवसर देती है। शैल कला और शैलाश्रयों के अलावा , भीमबेटका गत वर्षों के एक भग्‍न दुर्ग की दीवारों , लघु स्तूपों जैसे अनेक ऐसे अवशेषों का स्‍थान भी है जो इस क्षेत्र में मौर्य /शुंग शासन काल में बौद्ध प्रभाव को दर्शाते हैं। चट्टानों को काट कर बनाए गए बिस्‍तर बौद्ध संन्‍यासियों के हैं। यहां अनेक अभिलेख हैं जो शुंग , कुशाण , गुप्‍त काल से संबंधित हैं। शंख लिपि के अभिलेख भी यहां प्राय: देखने को मिलते हैं जो अभी तक (पढ़े) नहीं जा सके हैं।
अत: परमार काल से संबंधित एक मंदिर के कुछ स्‍थापत्‍य खंड भी देखने को मिलते है। दिखाई देने वाले अवशेषों में वे चित्र भी हैं जो प्रवर पुरापाषाण काल से लेकर मध्‍य -युगीन काल तक की विभिन्‍न अवधियों से संबंधित हैं।
किंतु सभी खोजों में से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण खोज विभिन्‍न विश्‍वविद्यालयों द्वारा किए गए उत्‍खननों के दौरान अत्‍यधिक संख्‍या में पाषाण औजारों का पाया जाना है। इससे यह पता चलता है कि भीमबेटका के शैलाश्रयों ने पूर्व-पुरापाषाण काल से ही अतीत में लंबे समय तक वास स्‍थलों का कार्य किया। औजार भी उन उत्तरोत्तर परिवर्तनों को समझने मेँ मदद करते हैं जिन परिवर्तनों से होकर प्रागैतिहासिक मनुष्‍य गुजर रहा था। जब मनुष्‍य ने खाने के लिए शिकार आरंभ किया तो इस कार्य के लिए उसके औजा़र अनगढ़ , कुंद से तकनीकी औजारों के रूप में विकसित हुए और उसकी विभिन्‍न प्रकार की उन जरूरतों और आवश्‍यकताओं को पूरा करने लगे जो और अधिक विशिष्ट और विविध होती जा रही थीं।
कुल मिलाकर भीमबेटका की गुफाएं कला के अपने खजाने के लिए मानव इतिहास में अमूल्‍य ऐतिहासिक अभिलेख का काम करती हैं। यहां के शैल चित्र उस क्रमिक प्रगति और उन विभिन्‍न अनुकूलनों को रेखांकित करते हैं जो प्रागैतिहासिक मनुष्‍य ने अपनी जीवनशैली में किए थे। प्रागैतिहासिक मनुष्‍य अपने आराम और सुविधा के लिए प्राकृतिक तत्‍वों को धीरे -धीरे अपने अनुकूल बनाना सीख रहा था , इस तथ्‍य की झलक भीमबेटका की शैल कला में व्‍यापक रूप से देखने को मिलती है।

कैसे पहुँचें-

विमान द्वारा

भोपाल (भीमबेटका से लगभग 46 कि॰मी॰) निकटतम एयरपोर्ट है जो मुबाई, दिल्ली, इंदौर, ग्वालियर से जुड़ा हुआ है।

रेल द्वारा-

दिल्ली-चेन्नई और दिल्ली-मुंबई मुख्यलाईन पर भोपाल सुविधाजनक रेलवे स्टेशन है।

बस द्वारा

भोपाल- होशंगाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग-69 पर स्थित भीमबेटका बस मार्ग से भी जुड़ा हुआ है।

जुलाई से मार्च तक भ्रमण सुविधाजनक है।

सांस्कृतिक साइटें

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