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लाल किला

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लाल किला

सन् 1638 में शाहजहां (1628-58ई.) ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानान्तरित की और उसी समय शाहजहांनाबाद की स्थापना की थी जो दिल्ली का सातवां नगर है। यह अनगढ़े पत्थर की दीवार से घिरा है जिसपर बीच बीच में बुर्ज, द्वार और विकेट बने हुए हैं। इसके चौदह दरवाजों में से मोरी गेट, अजमेरी गेट, तुर्कमान गेट, कश्मीरी गेट और दिल्ली गेट सबसे महत्वपूर्ण हैं। इनमें से कुछ पहले ही ध्वस्त हो चुके हैं। इसका प्रसिद्ध नगर दुर्ग लाल किला या रेड फोर्ट है जो यमुना नदी के दाएं किनारे पर नगर के उत्तरी किनारे पर स्‍थित है। यह किला सलीमगढ़ के दक्षिण में स्थित है। इसका निर्माण सन् 1639 में प्रारंभ किया गया था और इसे पूरा करने में 9 वर्ष लगे। लाल किला आगरा के किले से भिन्न है और यह सुनियोजित ढंग से बनाया गया है क्योंकि आगरा में शाहजहां ने अनुभव प्राप्त किया था और यह भी कि यह एक ही व्यक्ति का कार्य था। यह किला एक असाधारण अष्टकोण के आकार का है जिसके पूर्व और पश्‍चिम में दो बड़े- बड़े पार्श्‍व हैं और दो मुख्य द्वार हैं जिसमे से एक पश्‍चिम में और दूसरा दक्षिण में है। इन्हें क्रमश: लाहौरी गेट और दिल्ली गेट कहा जाता है। हालांकि किले की दीवारों, द्वारों और कुछ अन्य संरचनाओं का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है तथापि महलों में संगमरमर का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है।

मेहराबदार तोरणपथ, जिसे छत्ताचौक कहते हैं, से होकर गुजरने के बाद पश्‍चिमी द्वार से नौबत-या नक्कार खाना (ड्रम-हाउस) पहुंचा जाता है जहां दिन में पांच बार संगीत बजता था और जो दीवाने-ए-आम में प्रवेश के लिए प्रवेश द्वार था। इसकी ऊपरी मंजिल में आजकल इण्डियन वॉर मेमोरियल म्यूजियम है।

दीवने-ए-आम (आम जनता के लिए हॉल) एक आयताकार हॉल है जिसके तीन लंबे गलियारे हैं और अग्रभाग में नौ मेहराबें हैं। हाल के पिछवाड़े एक शयनकक्ष है जहां संगमरमर की छतरी के नीचे शाही सिंहासन है और उसके नीचे अंदर की ओर संगमरमर का एक मंच है जो प्रधानमंत्री के लिए था। सिंहासन के पीछे की दीवार पाइएट्रा डूरा कार्य के खूबसूरत पैनलों से अलंकृत है जिसे फ्लोरेंसवासी कलाकार-ऑस्टिन डी बोरडीऑक्स द्वारा बनाया गया था। अपनी वीणा के साथ ओरफियस को यहां एक पैनल में चित्रित किया गया है। मूल रूप से यहां पूर्वी तटीय नगर भाग के साथ छह संगमरमर के महल थे। दीवाने-ए-आम के पीछे लेकिन महल से पृथक रंग महल (चित्रित महल) था जिसे इसकी भीतरी रंगीन सजावट के कारण ऐसा नाम दिया गया था। इसके अग्रभाग में मेहराबों वाला मुख्य हॉल है जिसके दोनों ओर मेहराबदार कक्ष बने हैं। एक जल प्रणाल (धारा) जिसे नहर-ए-बहिश्‍त (स्वर्ग धारा) कहते हैं, इसमें से होकर निकलती है। इसके मध्य भाग में संगमरमर का बेसिन है जिस पर हाथीदॉत से बना फव्वारा लगाया गया है। मुमताज महल जो मूल रूप में शाही हरम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, में आजकल दिल्ली पुरातत्‍व संग्रहालय स्‍थित है।

दीवाने-ए-खास (खास लोगों के लिए) अत्यधिक अलंकृत स्तंभ वाला हाल है जिसकी दांतेदार मेहराब पर टिकी समतल छत है। इसके स्तंभों का निचला भाग पाइएट्रा डूरा के फूलों से अलंकृत है जबकि ऊपरी भाग पर मूलरूप से सोने का मुलम्‍मा चढ़ा हुआ था। कहा जाता है कि इसका प्रसिद्ध मोर वाला सिंहासन (मयूर सिंहासन) संगमरमर की चौकी पर टिका हुआ था जिसे बाद में पारसी आक्रमणकारी, नादिर शाह सन् 1939 में ले गया था।

तस्‍बीह खाना, (व्यक्तिगत प्रार्थनाओं के लिए कक्ष) में तीन कमरे हैं जिसके पीछे ख्वाबगाह (सोने का कमरा/शयनकक्ष) है। तस्‍बीहखाना के उत्तरी आवरण पर न्याय के पैमानों (न्‍याय तुला) को दिखाया गया है जो तारों और बादलों के बीच आए अर्धचन्द्र पर लटके हुए दर्शाए गए हैं। ख्वाबगाह की पूर्वी दीवार के निकट अष्टभुजाकार मुसम्मन-बुर्ज है जहां से सम्राट हर सुबह अपनी प्रजा को दर्शन देता था। बुर्ज से बाहर को निकली हुई एक छोटी बालकनी (छज्जा) सन् 1808 में अकबर शाह द्वारा बनाई गई थी और यह वह बालकनी थी जहां से राजा, जॉर्ज और रानी, मेरी दिसम्बर 1911 में दिल्ली की जनता के समक्ष प्रकट हुए थे।

हमाम (स्नानघर) के तीन मुख्य भाग थे जो गलियारों द्वारा विभाजित थे। फर्श सहित इसका पूरा भीतरी भाग संगमरमर से निर्मित है और इसमें रंगीन पत्थर जड़े हुए थे। स्नान के लिए गर्म और ठण्डे पानी की व्यवस्था की गई थी और कहा जाता है कि पूर्वी भाग में लगे एक फव्वारे से गुलाब जल निकलता था। हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद है जिसे बाद में औरंगजेब (1658-1707 ई.) द्वारा बनवाया गया था। हयात बख्श बाग (जीवन देने वाला बाग) जोकि बारादरियों वाली मस्जिद के उत्तर में स्थित है और जिसमें बाद में पर्याप्त परिवर्तन किए गए और पुन: निर्माण किया गया। हयात-बख्श-बाग के मध्य में स्थित तालाब के मध्य भाग में लाल पत्थर का मंडप है जिसे जफर महल कहते हैं और इसे लगभग सन् 1842 में बहादुरशाह ।। द्वारा बनवाया गया था।

सन् 1644 में शाहजहां ने दिल्ली में अपनी महान मस्जिद, जामी मस्जिद बनवानी प्रारंभ की जो भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है और यह सन् 1650 में पूरी हुई। इसके पार्श्वों पर वर्गाकार चतुष्कोणीय मेहराबदार छत्ते बने हैं और मध्य में 100 मीटर चौड़ा टैंक है। यह उठी हुई प्लिंथ पर निर्मित है। इसके तीन भव्य प्रवेश द्वार हैं जहां लंबी सीढियों द्वारा पहुंचा जाता है। इसके प्रार्थना कक्ष (नमाज पढ़ने का हॉल) के अग्रभाग में ग्यारह मेहराब हैं और प्रत्येक पार्श्‍व पर चार मंजिला मीनारें हैं तथा ‘काले और सफेद’ संगमरमर की वैकल्पिक पट्टियों से अलंकृत तीन बड़े बड़े गुम्बद बने हैं।

स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

प्रवेश शुल्क:- भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 30/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य- 500/- रूपए प्रति व्यक्ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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