"All Centrally Protected Monuments & Museums of ASI will remain closed till 31.05.2021 or until further orders due to COVID situation."

पुराना-किला

hdr_delhi_puranaquila

ऐसा प्रतीत होता है कि शेरशाह सूर (1540-45 ई.) ने हुमायूँ द्वारा निर्मित दीनपनाह नगर को नष्ट कर दिया था और उसी स्थान पर पुराने किले का नगर दुर्ग स्थापित किया जो संभवत: इंद्रप्रस्थ का स्थल भी था और जिसे पाण्डवों की राजधानी माना जाता है। इसके चारों ओर विस्तृत नगर-क्षेत्र फैला हुआ है। दिल्ली के सात नगरों में पुराना किला छठा नगर है। ऐसा माना जाता है कि सन् 1545 में शेरशाह की मृत्यु के समय भी पुराना किला अर्द्धनिर्मित पड़ा हुआ था जिसे संभवत: हुमायूँ द्वारा पूरा करवाया गया था, हालांकि यह ज्ञात नहीं है कि कौन सा भाग बाद में बनवाया गया। निर्माण-योजना के अनुसार पुराना किला 2 कि.मी. के घेरे में फैला दीर्घायान किला है जिसका पूर्वी और पश्‍चिमी भाग बड़ा है। इसकी हल्की सी आगे की ओर झुकी हुई अनगढ़ पत्‍थरों से निर्मित ऊंची दीवारें हैं जो 4 मीटर मोटी और 21 मीटर ऊंची हैं। एरो स्लिट्स के ऊपर कंगूरे वाले मुंडेर हैं जिसके पीछे पूरे घेरे में दो गलियारों की गहराई में कक्षों की एक श्रृंखला बनी हुई है। पश्‍चिमी दीवार में पांच बुर्जों और तीन द्वारों के अतिरिक्त, इसके चारों कोनों में बड़े-बड़े बुर्ज हैं। सभी बहु-मंजिले हैं और पूर्व को छोड़कर प्रत्येक ओर एक-एक द्वार है। इन द्वारों पर सफेद और काले संगमरमर और रंगीन टाइल के अलंकरण के इस्तेमाल के साथ लाल बलुआ पत्थर का मुल्लमा चढ़ा है।

शेरशाह के नगर दुर्ग के चारों ओर विशाल नगर था और इसके घेरे (क्षेत्र) के दो स्थानों पर-दिल्ली मथुरा रोड पर स्थित पुराना किला और कोटला फिरोजशाह के पश्‍चिम में बड़े और प्रभावशाली द्वार लगाए गए थे जिन्हें काबुली या लाल दरवाजा कहते हैं।

कला-ए-कुहना मस्जिद जिसे पुराने किले के भीतर शेरशाह सूर द्वारा 1541 ई. में बनवाया गया था, का शाही प्रार्थनागृह के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। एक ओर तो मस्जिद की वास्‍तुकला शैली पूर्वाभासी है जिसे प्रारंभिक मुगल काल की वास्‍तु-विशेषताओं से लिया गया था और दूसरी ओर शेरशाह की वास्तुकला के अलंकरण चरण पर बल दिया गया है जो उसके द्वारा बनवाए गए मकबरों में देखे गए निरूपण से भिन्न है। इसके मध्य भाग में सतही टैंक सहित आंगन के पश्चिमी छोर पर नमाज पढ़ने के लिए एक आयताकार प्रार्थना-कक्ष है जिसमें नुकीली मेहराबों वाले पांच दरवाजों से प्रवेश किया जाता है।

कमल के फूलों के झब्बे लगा मध्य मेहराब सजावटी पट्टियों के भीतर बनाया गया है जिसके किनारों पर महीन कंगूरों वाले ज्यामितीय डिजाइन हैं और अभिलेख लिखे हुए हैं। खांचेदार योजना वाले प्रवेश मेहराब को भी वैसा ही बनाया गया है जिसमें एक चापाकार खिड़की है जो बड़े महराब और प्रवेश मेहराब के बीच ब्रेकटों पर टिकी है। पार्श्‍व मेहराब भी अलंकृत हैं लेकिन उतने नहीं जितना कि मध्य मेहराब है। कंगूरों वाली मुंडेर के नीचे ब्रैकेट की टेक देकर एक छज्जा बनाया गया है। हॉल की भीतरी पश्‍चिमी दीवार को पांच मेहराबी आलों में विभाजित किया गया है जिन्हें काले-सफेद संगमरमर के ज्यामितिक नमूनों से अच्छी तरह सजाया गया है और चौखटों की पट्टियों पर अभिलेख लिखे हुए हैं। मेहराब के डिजाइन अद्वितीय हैं जहां एक आले के भीतर दूसरा आला बनाया गया है जिससे अलंकरण को और निखारा गया है। उत्तरी और दक्षिणी ओर पार्श्‍व प्रवेश द्वार के ऊपर गवाक्ष खिड़कियां बनी हुई हैं जिनसे दूसरी मंजिल पर बने तंग गलियारों में रोशनी आती है जो मस्जिद में चारों ओर फैल जाती है। पिछले दो कोनों में अर्ध-अष्टकोणीय तीन मंजिली टावर हैं जो पार्श्व में खुलती हैं।

मस्जिद के दक्षिण में शेर-मंडल- संगमरमर द्वारा उभारे गए लाल पत्थर के दो मंजिला अष्टकोणीय टावर हैं जिसमें प्रत्येक पार्श्‍व पर एक मेहराब के भीतर एक खांचेदार आयताकार प्रवेश द्वार है और यही योजना दूसरी मंजिल पर भी दोहराई गई है। मूलत: यह एक आराम-गाह था जिसे हुमायूँ पुस्तकालय के रूप में उपयोग करता था। इसी की सीढियों से गिरकर उसकी मृत्यु हुई थी।

स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

प्रवेश शुल्क:- भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 15/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य- 200/- रूपए प्रति व्यक्ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

Facebook Twitter