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पट्टदकल -अधिक जानकारी

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भूमिका/ पहुंचने का मार्ग /ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य वास्‍तुकलात्मक उपलब्धियां /पट्टदकल में स्‍मारक

परिचय

जैसे ही कोई मालप्रभा नदी के पार पहाड़ियों और घाटियों से गुजरता है और ऊँचाइयों की चाप, जहां से पट्टदकल के पांडुरंग के मंदिर दिखाई देते हैं, की ओर मुड़कर देखता है तो वह अपने आप को भूलकर आनंद विभोर हो जाता है और विस्मित होकर अनायास ही कहने लगता है- वाह! कितने सुंदर , वाह! कितने भव्‍य , वाह! कितने शानदार।

पट्टदकल स्थित स्‍मारक समूह (15 ° 56 ’54 ”उ.-75 ° 49 ’06”) बादामी , जिला बागलकोट से 22 किमी की दूरी पर स्‍थित है। ये मालप्रभा नदी के बाएं तट पर ऊबड-खाबड़ किंतु सुरम्‍य भू-दृश्‍य के बीच स्थित है।

पहुंचने का मार्ग:

यह बादामी तालुक मुख्‍यालय , जिला बागलकोट से 22 किमी की दूरी पर स्‍थित है। हुबली -शोलापुर मीटर गेज लाइन पर बादामी सर्वाधिक नजदीकी रेलवे स्‍टेशन है। गोवा निकटतम हवाई अड्डा है और लगभग 125 किमी की दूरी पर हुबली में घरेलू विमान यात्रा सुविधाएं उपलब्‍ध हैं। पट्टदकल में ठहरने की सुविधाएं न होने के कारण बादामी पर्यटकों के ठहरने के लिए उपयुक्‍त स्‍थान है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य

पट्टदकल का इतिहास पूर्व-चालुक्‍य वंश के शासन काल से भी पहले का है। इस स्‍थान के सांस्‍कृतिक अवशेष प्रागैतिहासिक काल से हैं। प्राचीन काल में इस स्‍थान को किसुवोलाल (लाल मिट्टी की घाटी) या पट्टद -किसुवोलाल या रक्‍तपुर कहा जाता था। साहित्यिक रचनाओं में इसे पेटिर्गल (प्‍टोलेमी की कृति ‘ज्‍योग्राफी’-दूसरी शताब्‍दी ई. ( , किसुवोलाल (श्री विजय की कृति ‘कविराज मार्ग ’ -लगभग 840 ई.) और पट्टशिलापुर या हम्‍मीरपुर (सिंगीराजा की कृति ‘हम्‍मीरकाव्‍य’- लगभग 1500 ई.) के नाम से अच्‍छी तरह से जाना जाता था।

आरंभिक चालुक्‍य साम्राज्य यहां विनयादित्‍य के शासन काल के दौरान (681-96 ई.) अपने चरम उत्‍कर्ष पर पहुंचा। चालुक्‍य वंश के राजाओं को इस स्‍थान पर अभिषिक्‍त किया जाता था , जैसा कि आरंभिक मध्‍ययुगीन काल के पुरालेखों और साहित्‍य में उल्‍लेख किया गया है और इसीलिए इस स्‍थान का नाम पट्टदकल अर्थात् राज्‍याभिषेक स्‍थल रखा गया। बादामी के चालुक्‍यों के शासन काल (7वीं-8वीं शताब्‍दी ई.) में निर्मित मंदिर समूह इस स्‍थान की पहचान है। यह चालुक्‍य कला , वास्‍तुकला और मूर्तिकला का सबसे बड़ा केंद्र था जैसा कि अभिलेखों से स्‍पष्‍ट होता है। यह राजनीतिक , ऐतिहासिक , धार्मिक और सांस्‍कृतिक गतिविधियों का स्‍थल था। पट्टदकल सांस्‍कृतिक राजधानी के रूप में, मुख्‍यत : अपनी सामरिक और उस पवित्र अवस्थिति के कारण फला -फूला जहां से मालप्रभा नदी उत्‍तर दिशा (उत्‍तरवाहिनी) की ओर मुड़ती है। बाद में यह एक राजनीतिक , ऐतिहासिक और धार्मिक केंद्र बन गया।

स्‍थापत्‍य कलात्मक उपलब्धियॉं

राजनीतिक स्‍थितरता , प्रचुर मात्रा में सामग्री की उपलब्‍धता और शांतिपूर्ण वातावरण सहित समृद्धि तथा चालुक्‍य वंश के शासन काल में धार्मिक सहिष्‍णुता का स्‍तर बहुत ऊँचा होने के कारण चहुंमुखी सांस्‍कृतिक विकास हुआ जैसाकि विशेष रूप से कला , वास्‍तु-कला , साहित्‍य , प्रशासन तथा अन्‍य ऐसे क्षेत्रों से प्रतिबिंबित होता है। दक्षिण भारत के संदर्भ में पहली बार धार्मिक वास्‍तुकला में शैलकृत तथा संरचनात्‍मक, दोनों माध्यमों में अत्‍यधिक तेजी आई। स्‍थापत्‍यकला के तीन मुख्‍य केन्‍द्रों -ऐहोले , बादामी और पट्टदकल में प्रकार्यात्‍मक रूप से और सौंदर्य बोध की दृष्टि से आकर्षक मंदिर मॉडलों के निर्माण के लिए प्रयोग किए गए।

अनेक स्‍वदेशी तत्‍वों का तत्‍समय प्रचलित उत्‍तरी और दक्षिणी शैलियों के स्‍थापत्‍यकला और मूर्तिकला विषयक गुणों के साथ सामंजस्‍यपूर्ण सम्‍मिश्रण किया गया। अत : बादामी के चालुक्‍यों का सबसे बड़ा योगदान दो प्रमुख मंदिर शैलियों- दक्षिणी -द्रविड़ -विमान शैली और उत्‍तरी- रेखा नागर प्रासाद शैली का विकास है इन शैलियों का विकास ऐहोल में निरंतर प्रयोगों के साथ आरंभ हुआ, फिर यह बादामी में जारी रहा और पट्टदकल में जाकर अपने चरम पर पहुंचा। जहां तक स्‍थापत्‍य कला और मूर्ति-कला शैलियों के विकास और प्रसार का संबंध है , कांचीपुरम् के पल्‍लवों के साथ राजनीतिक संघर्ष का सकरात्‍मक प्रभाव पड़ा और दोनों के लिए यह लाभकारी सिद्ध हुआ।

पट्टदकल स्‍थित मंदिर समूह में 10 मंदिर हैं। 8 मंदिर एक समूह में हैं। एक मंदिर मुख्‍य समूह के उत्‍तर में आधा कि.मी. की दूरी पर और दूसरा मुख्‍य समूह के लगभग 1.5 कि.मी. उत्‍तर पश्‍चिम में स्‍थित है। ये मंदिर शैली की दृष्टि से दो सुस्‍पष्‍ट श्रेणियों में विभक्‍त हैं। द्रविड़ विमान प्रकार के मंदिरों का प्रतिनिधित्‍व विरूपाक्ष , मल्लिकार्जुन और संगमेश्‍वर मंदिर करते हैं और रेखा नागर प्रासाद शैली के मंदिरों का प्रतिनिधित्‍व कडासिद्धेश्‍वर , जम्‍बूलिंगेश्वर , गलंगनाथ , काशीविश्‍वेश्‍वर तथा पापनाथ मंदिर करते हैं। समूह की सबसे आरंभिक काल की संरचना- संगमेश्वर द्रविड़ विमान शैली का एक उत्‍तम उदाहरण है। विरूपाक्ष मंदिर का निर्माण , राजा विक्रमादित्‍य – ।। (733-745 ई.) की पटरानी, त्रिलोक्य महादेवी ने करवाया था। यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें वास्‍तु-योजना , ऊँचाई और शैली से संबंधित समस्‍त नियमित अथवा निर्धारित तत्‍वों ने मूर्त रूप पाया है। मंदिर की बाह्य दीवार की सतह हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों द्वारा सममितिक रूप में उत्‍कीर्णित है जो जीवन्‍तता और भव्य अवयव संघटन को व्‍यक्‍त करता है। भीतरी भाग के स्‍तंभ भी इसी प्रकार व्याख्यात्मक पैनलों से अलंकृत हैं जिन पर चुनिंदा महाकाव्‍यों के प्रसंग-दृश्‍य चित्रित हैं। साथ का मल्लिकार्जुन मंदिर एक अन्‍य अनुकरणीय निर्माण है। परिसर में गलगनाथ मंदिर पूर्ण विकसित रेखा नागर प्रासाद शैली को व्‍यक्‍त करता है और पड़ोसी आंध्रप्रदेश में आलमपुर के उस समय के समकालीन मंदिरों की विशेषताओं को अपने में समाहित किए हुए है।

अभिलेखों में वास्‍तुकारों और कलाकारों से संबधित जानकारी के अलावा, मंदिर निर्माण का काल और मंदिर निर्माण करने वाले व्‍यक्तियों के नाम वर्णित हैं जिससे इन संरचनाओं का महत्‍व और बढ़ गया है। संक्षेप में पट्टदकल के मंदिर विभिन्‍न भवन निर्माण शैलियों और कलात्‍मक परंपराओं के सह-अस्तित्‍व का आश्‍चर्यजनक उदाहरण प्रस्‍तुत करते हैं।

मूर्तियां लालित्‍य , उन्नत कल्‍पनाशीलता और संरचना संबंधी सूक्ष्‍म तथा आलंकारिक अवयवों जैसे गुणों से युक्त हैं। छत पर मिथुन , दिक्पालों और सूर्य की सुंदर अनुपातिक मूर्तियां एवं लालित्‍यपूर्ण ढंग से तराशी गई दुर्गा , नटराज , लिंगोद्भव , अर्धनारीश्‍वर , गजासुरमर्दन , अंधकासुर मर्दन तथा अन्‍य शैव मूर्तियां , विभिन्‍न मनोदशाओं में वराह के रूप में विष्‍णु , जीवंत त्रिविक्रम , गरूड़ासीन विष्‍णु तथा अन्‍य रूपों को दीवारों पर उकेरा गया है। ये पत्‍थर में लय , सुंदरता , शक्ति , रोमांस तथा अन्‍य विभिन्‍न मनोभाव उकेरने की चालुक्‍य वंश के वास्‍तुकारों की दक्षता का पर्याप्‍त प्रमाण है। इन मंदिरों में हम रामायण , महाभारत जैसे महाकाव्‍यों और भागवत , किरातार्जुनीय तथा पंचतंत्र से भी विभिन्‍न प्रसंगों को दर्शाने वाले व्याख्यात्मक पैनल हैं।

पट्टदकल में स्मारक

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