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पांडुलेणा गुफाएं, नासिक

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पांडुलेणा या पांडवों की गुफाओं के नाम से लोकप्रिय 24 गुफाओं के उत्खनन का यह समूह (प्राचीन काल में त्रिरश्मी के नाम से जानी जाने वाली पहाड़ी के उत्‍तर की ओर) नासिक शहर (नासिक या नासिक्‍य नाम का प्रचीन नगर, जिसका उल्‍लेख पश्चिमी भारत की गुफाओं के अनेक संदाता अभिलेखों में मिलता है) के 8 कि॰मी. दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। गुफाओं को आसपास की समतल भूमि से लगभग 60-70 मीटर की ऊंचाई पर काटा गया है। यह पहाड़ी त्रिरश्मी के नाम से भी जानी जाती थी जिसका कारण शायद यह था कि यहां पहाडियों के तीन स्‍वतंत्र समूह हैं जो सह्याद्रि पर्वतमाला की त्रिम्‍बक-अन्‍जानेरी श्रंखला का अंत होता है। भारतीय साहित्‍य में ईसा-पूर्व के काल में भी नासिक का उल्‍लेख मिलता है। पश्चिमी भारत के पत्तनों तथा उत्‍तर और दक्षिण भारतीय नगरों को जोड़ने वाले प्राचीन सड़क मार्ग पर स्थित होने के कारण प्राचीन काल के दौरान नासिक एक प्रमुख नगर था। यहां किए गए उत्खनन से यह पता चलता है कि लगभग पांचवीं सदी ई.पू. से ही यहां निरंतर लोगों का वास रहा है। उत्तर का काला परिष्कृत मृद्भांड (उत्तर का काला परिष्कृत मृद्भांड -आम तौर पर लगभग ई.पू. छठी शताब्‍दी से आंरभ होता है और मौर्य काल के दौरान तक प्रचुर मात्रा में प्रयोग में रहा) की मौजूदगी से उत्‍तर भारतीय नगरों के साथ इसके संपर्क का पता चलता है।

जैसा कि इस क्षेत्र की अन्‍य गुफाओं के उत्खनन के मामले में हुआ, नासिक्य केंद्र भी उदारतापूर्ण दान और सभी वर्गो के लोगों के संरक्षण के कारण ही फला-फूला। यहां अत्‍यधिक संख्‍या में पाए गए अभिलेख इस तथ्‍य को प्रमाणित करते हैं। गुफाओं के इस समूह का श्रेय सातवाहन वंश के अनेक राजाओं से मिले संरक्षण को जाता है। सातवाहन वंश का शासन काल आम तौर पर तीसरी शताब्‍दी ई.पू. से तीसरी से चौथी शताब्‍दी ईसवी के बीच का माना जाता है और इनकी राजधानी प्रतिष्‍ठान (आधुनिक पैठण, जिला औरंगाबाद थी। यहां पाए गए अभिलेखों में कृष्‍णा (लगभग 205-187 ईसा पूर्व); गौतमी पुत्र सातकर्णी (लगभग 106-130 ईसवी) वसिष्‍ठीपुत्र पुलमावि (लगभग 130-158 ईसवी) श्री यज्ञश्री सातकर्णी (लगभग 171-201 ईसवी) जैसे सातवाहन वंश के राजाओं का और नहपान (लगभग 119-125 ईसवी) और उसके दामाद, क्षाहारात वंश के उसवदत्ता का उल्‍लेख भी मिलता है। एक शक परिवार- क्षाहारात सातवाहन वंश का समकालीन था और उनके सातवाहन वंश के साथ वैवाहिक संबंध भी थे। यहां सबसे पहले बने दो बौद्ध विहार सातवाहनों और क्षाहारात द्धारा बनवाए गए थे। आम लोगों जिनमें अनेक भिक्षु और एक लेखक शामिल था, ने गुफाओं के लिए दान दिया। यह लेखक दशपुर (दशपुरा आधुनिक मंदसौर, मध्य प्रदेश) का एक शक था। राजपरिवारों के जिन अन्‍य सदस्‍यों ने दान दिया उनमें गौतमी लबसारी (गौतमी पुत्र सातकर्णी की मां), नहपान का दामाद, उसवदत्ता और अभीर मधारपुत्र ईश्‍वरसेन शामिल हैं।

यहां के आंरभिक उत्खननों का काल दूसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है और यह स्‍थान छठी से सातवीं शताब्‍दी ईसवी तक इस्तेमाल में रहा। दूसरी शताब्‍दी के दौरान यहां गतिविधियों की भरमार रही जैसा कि यहां के अनेक अभिलेखों से प्रमाणित होता है। उत्‍तरवर्ती कालों में यहां बहुत कम उत्खनन हुआ और पहले से उत्खनित गुफाओं में ही फेर-बदल किया गया।

यहां हुए उत्खनन में चैत्यगृह, विहार और जलकुंड शालिल हैं। गुफा संख्‍या-18 एक चैत्यगृह है जो नासिक का सर्वाधिक विशिष्‍ट और महत्‍वपूर्ण चैत्यगृह है। इस गुफा का आरंभिक उत्खनन ईसा पूर्व पहली शताब्‍दी में आरंभ हुआ जैसा कि एक अभिलेख से प्रमाणित होता है, हालांकि अपने मौजूदा रूप में यह पहली शताब्‍दी ईसवी या इसके थोड़ा बाद पूर्ण हुई थी। इस गुफा का आरंभिक स्‍वरूप अग्रभाग पर लकड़ी की कारीगरी की अनुकृति से प्रमाणित होता है। इस गुफा का निर्माण कार्य तीन चरणों में पूरा हुआ होगा। पहले चरण के दौरान अग्रभाग का उपरी भाग पूरी सज्‍जासहित पूर्ण हुआ होगा। दूसरे चरण के दौरान चैत्‍य हॉल की प्रतिष्‍ठा हुई होगी और तीसरे तथा अंतिम चरण में चट्टान के पिंड के अग्रभाग को आकार दिया गया होगा और सीढियां बनाई गई होंगी। अग्रभाग पर चैत्‍य खिड़कियों, रेलिंगों, शहतीरों के सिरों वाली धरनों, अष्‍टकोणीय शाफ्टों के वाले स्तंभो, पाएदार स्तम्भ उपशीर्षक भागों के नीचे घंटी के आकार के अवयवों और अलंकृत पशु शीर्षों से अत्‍यधिक नक्‍काशी की गई है। भीतरी हॉल गजपृष्ठीय है जो 12 मीटर लंबा और 6.5 मीटर चौड़ा है और यह 17 स्तभों की एक पंक्‍ति द्वारा एक केंद्रीय मध्‍यभाग और आठ पार्श्‍वों में विभक्‍त है। 3.6 मीटर ऊंचा एक स्‍तूप मध्‍यभाग के पीछे की ओर स्थित है। स्तंभों की सीढ़ीदार पीठिकाओं पर सजावटी घट आधारों को छोड़कर चैत्यगृह सादा है। कुछ स्तंभ केवल सादे अष्‍टकोणीय हैं। स्‍तूप की मेधी (ड्रम) विशेष रूप से ऊंची है जिसके ऊपर एक अर्धवृत्‍ताकार स्‍तूप (अंड) एक रेलिंग के सहारे टिका हुआ है और जिसके शीर्ष पर एक हर्मिका और एक औंधा सीढ़ीदार पिरामिड है।

इस गुफा में तीन अभिलेख पाए गए हैं। पहला प्रवेश द्वार के ऊपर, चाप के शीर्ष के नीचे है जिस पर ^नासिका के धम्बिकागाम (के निवासियों) का उपहार” लिखा है। दूसरा अभिलेख प्रवेश द्वार के बायीं ओर यक्ष की मूर्ति के ऊपर की पट्टी पर है जिस पर ^रेलिंग पैटर्न और यक्ष की रचना ना‍दसिरिया नामक एक व्‍यक्ति ने करवाई थी* लिखा है। तीसरा अभिलेख हॉल के दो स्तंभों के अष्‍टकोणीय मुखों पर है जिसमें ^त्रिरश्मि पहाड़ी पर स्थित चैत्यगृह, राजदरबार के एक मंत्री की पुत्री महाकुश्री भटपालिका द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था* लिखा है।

इस चैत्यगृह (गुफा 18) के दोनों ओर दो बौद्ध विहार (गुफा-17 और 20) स्थित हैं जिनकी ओर जाने का मार्ग गुफा संख्‍या-18 की सीढियों की ओर से है। गुफा संख्‍या-20 जो कि एक बौद्ध विहार है, पहले एक संन्यासी द्वारा आंरभ किया गया था लेकिन अंतिम निर्माण या समापन महासेनापति की पत्‍नी द्वारा सातवाहन नरेश यज्ञ श्री सातकर्णी के शासनकाल के 7 वें वर्ष के दौरान हुआ था। इस गुफा में बाद के काल में प्रकोष्‍ठ बनाने, एक मंदिर का निर्माण करने और हॉल को बड़ा बनाने के रूप में छठी-सातवीं सदी ई. में परिवर्धन हुए। इस मंदिर की एक मूर्ति में बुद्ध की सेवा में पद्मपाणि और बज्रपाणि को दिखाया गया है।
गुफा संख्‍या-17 भी इसी काल से संबंध रखती है और यह दत्‍तामित्री के एक यवन द्वारा उपहार में दी गई थी। बाद के काल में जब बुद्ध की एक मूर्ति यहां जोड़ी गई तो इस गुफा में भी परिवर्धन और फेर-बदल हुए।

बौद्ध विहारों में गुफा संख्‍या-19 का उत्खनन नासिक के एक संन्‍यासी द्वारा सातवाहन वंश के राजा कृष्‍णा के शासक काल के दौरान हुआ। बौद्ध विहार गुफा संख्‍या-3 और 10 यहां की सभी गुफाओं में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण हैं और सबसे बड़ी हैं।

गुफा संख्या-10 शक-उषभदत और उसकी पत्‍नी दक्षमित्रा का उपहार है जो क्षाहारात परिवार के राजा नहपान की पुत्री थी। इस परिवार के कई अभिलेख बरामदे की दीवारों और प्रांगण की बायीं दीवार पर देखे जा सकते हैं। दान में वर्षा के दौरान 20 भिक्षुओं के लिए कपड़ों की सामग्री, मिताहार और रूग्‍ण संन्‍यासियों (भिक्षुओं) के लिए दवा उपल्‍ब्‍ध कराने हेतु स्‍थायी प्रंबध शामिल था। दवा का स्‍थायी प्रबंध अभीर राजा, ईश्‍वरसेन के शासन काल के दौरान शक वंश की एक महिला भक्‍त द्वारा किया गया था। इस गुफा में स्तंभों वाला बरामदा है जिसके दोनों ओर एक-एक प्रकोष्‍ठ है और एक बहुत लंबे-चौडे हॉल के तीन ओर पत्‍थर के बिस्‍तर सहित 16 प्रकोष्‍ठ हैं। बरामदे के स्‍तंभ अत्‍यधिक अलंकृत हैं और इन्‍हें इस काल का सर्वश्रेष्‍ठ कला नमूना कहा जा सकता है। इसमें एक सीढ़ीदार पीठिका पर घट आधार पर टिकी अष्‍टकोणीय शाफ्ट है जो एक औंधे घट द्वारा मुकुटित है और उसके बाद इस पर अंडाकार फ्रेमों में संपीडित अमलक और औंधा पाएदार शीर्षफलक है। शीर्षों पर अलंकृत जानवरों-सांड, सिंह, लंगूर, मेष और संयुक्त आकृतियां हैं।

गुफा संख्‍या-3 पुन: एक विहार है जो थोड़ी बाद की अवधि का है किंतु गुफा संख्‍या-10 से कहीं अधिक अलंकृत है। गुफा संख्‍या-3 सातवाहन शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली गौतमीपुत्र सातकर्णी की माता, गौतमी बलसारी का उपहार थी। यहां पाए गए अभिलेख में यह लिखा है कि यहां का कार्य गौतमीपुत्र सातकर्णी के शासन काल के दौरान आंरभ हुआ था और उसके पुत्र, वसिष्‍ठीपुत्र पुलमावि के 19 वें वर्ष के दौरान पूर्ण हुआ था। दान में गुफा को चित्रों से अलंकृत करने की लागत का भुगतान करने के लिए एक गांव भी शामिल है। इसकी निर्माण योजना में एक स्‍तंभ युक्‍त बरामदा है, प्रकोष्‍ठों वाला एक हॉल है, आगे की ओर तीन तरफ बेंच हैं और पृष्‍ठ भित्ति के केंद्र में एक स्‍तूप की नक्काशी है। बरामदे के स्‍तंभ डिजाइन और कारीगरी के संदर्भ में गुफा संख्‍या-10 से मिलते-जुलते हैं। अपवाद यह है कि यहां रेलिंग पैटर्न और यक्ष मूर्तियों सहित एक नीची प्राकार भित्ति है। ये स्‍तंभ अत्‍यधिक अलंकृत और सज्जित मुंडेर को सहारा देते हैं जो एक छज्जे की तरह दिखाई देती है जिसमें लकड़ी के शहतीर और बंधन- धरनों की समस्‍त विशेषताएँ निहित हैं। मुख्‍य हॉल में प्रवेश एक द्वार से होता है जिसकी चौखट को तोरण के रूप में अलंकृत किया गया है जबकि शाफ्ट शकों के रूप में है और उस पर गणों, प्रणय-मुद्राओं और नायिकाओं की आकृतियां हैं। प्रवेश द्वार पर दो द्वारपाल पहरा दे रहे हैं।

गुफा संख्‍या-23 में बुद्ध, बोधिसत्‍वों, देवियों आदि की मूर्तियां सबसे अधिक संख्‍या में हैं। महापरिनिर्वाण को चित्रित करने वाला पैनल भी यहां देखा जा सकता है।

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