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स्‍मारक समूह, महाबलीपुरम् (1984), तमिलनाडु

स्‍मारक समूह, महाबलीपुरम् (1984), तमिलनाडु

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मामल्लों का नगर, मामल्लपुरम् का नाम महान पल्‍लव शासक, नरसिंहवर्मन-1 (630-680 ई.) की उपाधि पर रखा गया है। यह पेरीप्‍लस (पहली सदी ई.) एवं पटोलमी (140 ई.) के समय में एक बन्‍दरगाह हुआ करता था और बहुत से भारतीय उपनिवेशक इस बन्‍दरगाह शहर से होकर दक्षिण-पूर्व एशिया को जाया करते थे। यद्यपि मामल्ल के पिता, महेन्‍द्र वर्मन-। (600-30 ई.) के काल के दौरान हुई स्‍थापत्‍य संबंधी गतिविधियों के कुछ साक्ष्‍य मिलते हैं, अधिकतर स्‍मारक जैसे कि पत्‍थरों को काटकर बनाए गए रथ, खुले में पडे पत्‍थरों पर

मूर्तिशिल्‍प के दृश्‍य जैसे अर्जुन की तपस्‍या, गोवर्धनधारी एवं महिषासुर मर्दिनी की गुफाएं, जल-शयन पेरुमाल मंदिर (समुद्र तटीय मंदिर परिसर के पिछले भाग में सोते हुए महाविष्‍णु या चक्रीन) नरसिंह वर्मन, प्रथम मामल्ल के काल के हैं।

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महाबलीपुरम में पाए गए नौ एकाश्मी मंदिरों में सबसे महत्‍वपूर्ण पांच रथ हैं जिनके नाम महाभारत के प्रसिद्ध पांच पांडवों के नाम से जाने जाते हैं। ये स्‍मारक एक ही पत्‍थर से बनाए गए हैं जिनमें वास्‍तुयोजना और उत्‍थान के सभी ज्ञात रूपों का चयन किया गया है। धर्मराज, अर्जुन, द्रौपदी रथ वास्‍तुयोजना में वर्गाकार हैं जबकि भीम और गणेश रथ आयताकार हैं तथा सहदेव रथ गजपृष्ठाकार है।
द्रौपदी रथ कुटाग्र वेदिका जैसी साधारण झोपड़ीनुमा है जबकि अर्जुन रथ मुखमंडप के साथ द्वितल विमान है। भीम रथ चौपहिया गुंबदाकार छत के साथ आयताकार है। धर्मराज रथ एक त्रितल विमान है जिसके सभी तलों की वेदिकाएँ प्रयोग में हैं। गजपृष्ठाकार वास्‍तुयोजना और उत्थान वाला नकुल-सहदेव रथ वास्‍तुविद् की प्रयोगात्‍मक प्रवृति दर्शाता है।

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यद्यपि अंतर्काट एवं बहिर्काट, दोनों तरह की एकाश्म मूर्तिशिल्‍प कला बाद की अवधि (अतिरनचंद गुफा, पिडारी रथ एवं बाघ-गुफा) के दौरान भी चलती रही) तथापि वृहद् पैमाने पर संरचनात्‍मक वास्‍तुकला की शुरूआत पल्‍लव, राजसिम्‍हा (700-28 ई.) द्वारा की गयी थी जो विश्‍व प्रसिद्ध समुद्र तटीय मंदिर के निर्माण के समय पराकाष्‍ठा पर पहुंच गई थी।

समुद्र तटीय मंदिर तीन मंदिरों का एक परिसर है अर्थात राजासिंहेश्‍वर (एक छोटा सा त्रितल विमान जो पश्चिमोन्मुखी है), क्षत्रिय सिंहेश्‍वर (बड़ा पूर्वाभिमुखी विमान) और नृपतिसिम्हा पल्‍लव विष्‍णुगृह (पूर्वाभिमुखी, अंडाकार, सपाट छत वाली मंडप वेदिका) जिसमें लेटी हुई मुद्रा में विष्‍णु स्‍थापित है। ये मंदिर दो प्राकार दीवारों से घिरे हैं जिनमें द्वार बाद में लगाए गए। प्राकार दीवारों की आंतरिक सतह पर कभी मूर्तियों के पैनल होते थे जो अब जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं।

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यहां के उल्‍लेखनीय गुफा मंदिरों में वराह मंडप, महिषमर्दिनी मंडप, परमेश्‍वर महावराह विष्‍णुगृह (आदिवराह गुफा) हैं। ये मंदिर मामल्ल शैली में हैं जबकि आदिरनचंद गुफा के मंदिर महेंद्र काल के हैं।

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इन गुफाओं में कभी प्‍लास्‍टर और पेंट भी किया गया होगा जैसाकि अवशेषों से पता चलता है। परवर्ती-पल्‍लव एवं चोल काल के ही कुछ वास्‍तु-संयोजन को छोड़ दिया जाए तो राजसिम्‍हा के बाद इस स्‍थान की वास्तुकला गतिविधियां मंद सी हुई लगती हैं। यहां भव्‍य विजयनगर चरण का प्रतिनिधित्व राजा गोपुरम और स्‍थल शयन मंदिर करता है जो अर्जुन की तपस्‍या के उकेरे गए गोलाश्‍म के पास अवस्थित हैं।

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समुद्र तटीय मंदिर के उत्‍तर एवं दक्षिण की तरफ हाल ही में की गई खुदाई में पत्‍थर को काटकर बनाई गई मूर्तियों का पता चला है जो इस मंदिर के निर्माण से पूर्व की अवधि के धार्मिक विषयों का प्रतिनिधित्‍व करती हैं। एक एकाश्‍मी भूवराह के अतिरिक्‍त, विश्राम की मुद्रा में विष्‍णु की मूर्ति, दुर्गा मंदिर का आधार जिसमें हिरण और एक वर्गाकार साकेट है जो संभवत: महास्‍तंभ को स्थापित करने के लिए था, का भी पता चला है। समुद्र तटीय मंदिर के दक्षिण की ओर समुद्र के अभिमुख एक सीढ़ीदार घाट खुदाई से निकला है।

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सुबह छह बजे से शाम के छह बजे तक खुला रहता है।

प्रवेश शुल्क: भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 40/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य- 600/- रूपए प्रति व्यक्ति
(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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