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टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-तमिलनाडु महाबलीपुरम् स्‍मारक समूह, जिला कांचीपुरम् एकाश्म मंदिर

महाबलीपुरम् स्‍मारक समूह, जिला कांचीपुरम्

एकाश्म मंदिर

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महाबलीपुरम् में लगभग नौ एकाश्म मंदिर हैं। भारतीय कला को पल्‍लवों का यह अदभुत् योगदान है। इन एकाश्म मंदिरों को स्‍थानीय रूप से रथ कहा जाता है क्‍योंकि ये मंदिर शोभायात्रा में निकाले जाने वाले रथों से मिलते-जुलते हैं। सभी एकाश्म मंदिरों में उत्कृष्ट ये पांच रथ विशाल चट्टान को काट कर बनाए गए हैं। विभिन्‍न योजना और ऊंचाई के इन मंदिरों को तराशा गया है और छुटे हुए भागों का उपयोग बुद्धिमत्‍तापूर्वक पशुओं को प्राकृतिक रूप में उकेरने के लिए किया गया है। इन रथों को महाभारत ग्रन्‍थ के नायकों-पांडवों और उनकी पत्‍नी के नाम दिए गए हैं जो एक स्‍थानीय परंपरा है।

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पांच रथों के नाम से प्रसिद्ध ये एकाश्म मंदिर बाएं से दाएं इस प्रकार अवस्थित हैं- द्रौपदी, नकुल-सहदेव, भीम, एवं धर्मराज रथ।

धर्मराज रथ

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धर्मराज रथ
पांच रथों में से धर्मराज रथ सबसे प्रभावशाली एवं समृद्ध मूर्तिशिल्प है। तीन तल वाले (तीन मंजिले) विमान के तल तो वर्गाकार हैं किंतु इसका ग्रीवा शिखर वाला भाग अष्‍ट-कोणीय है और पश्चिमोन्‍मुखी है। कोने वाले ब्‍लॉक में गर्भगृह के चारों ओर शिव, हरिहर, ब्रह्मा शास्‍त, ब्रह्मा की सामान्य मूर्तियां हैं और अर्धनारीश्‍वर का एक लालित्‍यपूर्ण और संतुलित रूप चित्रित किया गया है। इसके अतिरिक्‍त, एक राजा का चित्र है जो संभवत: स्‍वयं नरसिहंवर्मन प्रथम है। इस चित्र के ऊपर उसकी पदवियां- श्रीमेधा और त्रैलोक्‍य-वर्धन-विधि उत्कीर्णित हैं। ऊपरी तल जो मूर्तियों की एक वास्‍तविक दीर्घा है, में गंगाधर के रूप में शिव की उत्‍कृष्‍ट रूप में प्रतिरूपित मूर्ति, तमिल क्षेत्र में नटेश के रूप में शिव के आंरभिक रूप का प्रतिनिधित्व करती हुई मूर्ति, वृषबंतिका, कंकालमूर्ति, गरूड़ पर विश्राम कर रहे विष्‍णु और कालियामर्दन की मूर्तियां भी मौजूद हैं। एक अभिलेख में इस मंदिर का नाम सबसे ऊपर के तल में अत्‍यंतकाम पल्‍लवेश्‍वरम दिया हुआ है। अत्‍यंतकाम पदवी परमेश्‍वर वर्मन-। को दी गई थी।

भीम रथ:

यह एकाश्म रथ वास्‍तुयोजना में अंडाकार है और इसमें एकतल विमान है। संभवत: इसे विष्‍णु की विश्राम मुद्रा को समर्पित किया जाना था। केवल प्रभावशाली साल-शिखर ही पूर्णतया परिष्कृत है और भूतल के ऊपर हार और ऊंची ग्रीवा दीवार है। साल छत पर स्‍तूपियों एवं त्रिकोणपार्श्‍वों के ऊपर अस्‍त्रदेव त्रिशूल कलशों की श्रृंखलाओं को आधार प्रदान करने के लिए सशक्‍त नासिकाएं हैं। त्रिकोणिका पार्श्‍वो को आकर्षक कला भावों द्वारा उत्‍कृष्‍ट रूप से उभारा गया है और केंद्र में एक वृत्‍ताकार तथा मुकुटीय स्‍तूपी सहित एक वर्गाकार एकतला पूजास्‍थल का एक लघु मॉडल है।

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भीम रथ

अर्जुन रथ :

यह एकाश्म विमान उन पांच विमानों में से एक है जिसे एक चट्टान को तराश कर बनाया गया है। इस छोटे द्वितल (दो स्‍तरीय) विमान में वास्‍तुयोजना में एक स्‍तंभयुक्‍त मुखमंडप सहित एक गर्भगृह है। इसमें द्रौपदी रथ सहित एक उपपीठ है। अधिष्‍ठान साधारण पदबंध प्रकार का है। पाद वाले भाग में सुरूचिपूर्ण रूप से उकेरे गए स्‍तंभों के बीच काट कर आले बनाए गए हैं जिनमें पार्थीहारों, अमरों, एक सिद्ध, एक चवरी धारक, अप्‍सराओं और विष्‍णु, हाथी पर स्‍कंद तथा शिव-वृषभांतिक जैसे विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियां हैं। ऊपरी तल (मंजिल) में अष्‍टकोणीय शिखर सहित एक हार है। यहां कच्ची चट्टान में से एक स्‍तूपी को तराशा गया है किंतु उसे चट्टान से अलग नहीं किया गया है। शायद यह स्‍तूपी विमान के शिखर को मुकुटित करने के लिए बनाई गई थी।

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अर्जुन रथ

द्रौपदी रथ:

पांच एकाश्म रथों में से यह सबसे छोटा है और उत्‍तर दिशा में स्थित है। यह एक साधारण कुटिया जैसा कुटाग्र-विमान वाला रथ है। इसमें अर्जुन रथ सहित एक उपपीठ है। ऊंचाई में इस विमान में एक साधारण पदबंध अधिष्‍ठान है। पद वाले भाग में देवकोष्‍ठ हैं जिनमें दुर्गा की प्रतिमाएं हैं। कपोत यहां दिखाई नहीं पड़ता। छत कुटिया के आकार की है जिसके जोड़ों में अलंकारिक कला-भाव हैं। उपपीठ के कोने में तल-शिला में से स्‍तूपी को तराशा गया है किंतु इसे शिला से अलग नहीं किया गया है। गर्भगृह में दुर्गा की एक उत्‍कृष्‍ट प्रतिमा है जो शायद बाद के काल की है।

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द्रौपदी रथ:

सहदेव रथ:

इस एकाश्म रथ की निर्माण योजना आधार से लेकर शिखर तक गजपृष्‍ठीय है जो आंरभिक चैत्‍य मॉडलों की याद दिलाती है। यह एक अलग शिलाखंड से बनाया गया है जो अर्जुन रथ के निकट खड़ा है और दक्षिणाभिमुखी है। इसमें एक द्वितलीय (दो मंजिला) विमान है। इस विमान का अधिष्‍ठान परिभाषित नहीं है। पद को भित्ति स्‍तंभों द्वारा साधारण रूप से चिह्नांकित किया गया है। आगे की ओर एक मुखमंडप है।

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सहदेव रथ

अन्‍य उल्‍लेखनीय एकाश्म मंदिर हैं- गणेश रथ और पिडारी रथ।

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गणेश रथ

अर्जुन की तपस्‍या

अर्जुन की तपस्‍या एक प्रभावशाली नक्काशी है जो नरसिंहवर्मन-। के काल की है जो किरातार्जुनीय की कहानी को सांकेतिक रूप से चित्रित करती है जिसमें महाभारत के महान योद्धा और नायक, अर्जुन ने भीषण युद्ध और कड़ी तपस्‍या के बाद शिव से सर्वव्‍यापी पाशुपत शस्‍त्र प्राप्‍त किया था। केंद्र में शिव तथा कृशकाय अर्जुन को तप करते प्रमुखता से दिखाया गया है। एक नदी के किनारे इस दृश्‍य का स्‍थान निर्धारण करने की कल्‍पना में कलाकार ने उल्‍लेखनीय सफलता प्राप्‍त की है। एक नाग और एक नागिन को चित्रित कर नदी के रूप में प्राकृतिक दरार की बुद्धिमत्‍तापूर्वक अभिव्‍यंजना की गई है। चंद्र , सूर्य , किन्‍नरों , गंधर्वों, अप्‍सराओं आदि, शिकार करते शिकारियों , पशुओं के झुंड , मंदिर के समक्ष तपस्‍या करते ॠषियों और मध्‍याहृन अनुष्‍ठान करते बाह्मणों की उपस्थिति और प्रस्‍तुति से इस दृश्‍य की शांति और नीरवता और अधिक बढ़ जाती है। एक सिंह के बगल में निश्चिंत होकर विश्राम करता मृग तथा पिछली टांगों पर तपस्‍या करती धूर्त बिल्‍ली के आसपास उछल-कूद करते चूहे मनोभाव में और वृद्धि करते हैं। पशुओं को सर्वाधिक प्राकृतिक रूप में और उचित अनुपात में चित्रित करना कलाकार की कुशल कला अभिव्‍यक्ति का प्रमाण है।

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