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Lenyadri Group of Caves, Junnar

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जुन्नार (19°10’ उत्‍तर; 73°53’प ूर्व), तालुक जुन्नार, जिला पुणे, पुणे से 96 कि.मी. की दूरी पर है और कुकड़ी नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। एक अन्‍य नदी मीना 5 कि.मी. पूर्व की ओर बहती है। जुन्नार की अवस्थिति भी आदर्श है क्‍योंकि यह सह्याद्रि और पूर्व की ओर के चौड़े मैदानी भाग के बीच के क्षेत्र में अवस्थित है। चारों ओर से यह पहाड़ियों की श्रंखलाओं द्वारा घिरा हुआ है अर्थात् पश्चिम में शिवनेई और तुलजा पहाड़ियों द्वारा; उत्‍तर और पूर्व में सुलेमान पहाड़ियों द्वारा और दक्षिण में मनमोडी पहाडियों द्वारा घिरा हुआ है । यह नानेघाट से भी अधिक दूर नहीं है जो पश्चिमी घाटों का एक महत्‍वपूर्ण पास है और जो सोपारा, कल्‍याण और थाणा के समुद्री पत्‍तनों को नासिक, पैठण, टेर आदि जैसे मुख्‍य भूभाग के नगरों और कस्‍बों के साथ जोड़ता है। नानेघाट से सातवाहन राजवंश के सदस्‍यों जैसे सातवाहन राजवंश के संस्‍थापक, सिमुका; श्री सातकर्णी, उनकी पत्‍नी नयनिका, उसके पिता त्राणयकीरा और उसके पुत्रों- हकुसरी और सातवाहन के अनेक लेबल अभिलेख और अधो नक्काशी युक्त मूर्तियां प्राप्‍त हुई हैं। समकालीन इतिहास में एक प्राचीन नगर के रूप में वर्णित इस स्‍थान की कई तरह से पहचान मिलती हैं। ऐसी ही एक पहचान नहपान की राजधानी मिन्नागार है।

जुन्नार में सबसे अधिक संख्‍या में उत्‍खनन हुआ है। यहां की चार पहाडियों में 200 से अधिक स्‍वतंत्र उत्‍खनन हुए हैं। उत्‍खनन हीनयान काल से संबंधित हैं और इनका समय ई.पू. तीसरी शताब्‍दी के मध्‍य से तीसरी शताब्‍दी ईसवी के उत्‍तरार्ध तक का है। चट्टानों को काटकर बड़ी संख्‍या में किए गए उत्‍खनन, अत्‍यधिक संख्या में अभिलेखों की उपलब्‍धता से पुरालिपि संबंधी अध्‍ययन संभव हुआ है जिसके कारण जुन्नार शैलकृत स्‍‍थापत्‍य कला के अध्‍ययन के लिए प्रमुख स्‍थल बन जाता है। यहां 24 अभिलेख हैं जो गुफाओं के सापेक्षिक काल निर्धारण के लिए उपयोगी पुरालिपि संबंधी डाटा उपलब्‍ध कराते हैं। दानकर्ताओं में राजपरिवार के सदस्‍य और आम आदमी हैं जिनमें यवन (ग्रीक) भी शामिल है। मनमोडी समूह के एक विशेष अभिलेख में महारथी नहपान (सन् 119 से 124) के एक मंत्री के नाम का उल्‍लेख है।

जुन्नार के गुफा समूह को इन उत्‍खननों की स्थिति के आधार पर आगे विभिन्‍न उप-समूहों में वर्गीकृत किया गया है। ये उप-समूह हैं:-
(क) तुलजालेणा, तुलजाबाई पहाड़ी पर जुन्नार के 5 कि.मी. पश्चिम में स्थित है। जुन्नार में यह गुफाओं का सबसे छोटा समूह है और यहां की गुफाओं का काल ई.पू. प्रथम शताब्‍दी के आसपास से लेकर प्रथम शताब्‍दी ई. तक का है। ये गुफाएं एक साथ एक पंक्ति में स्थित हैं और मोटे तौर पर पूर्व-उत्‍तर, पूर्व दिशा की ओर अभिमुख हैं।

(ख) मनमोडी गुफा समूह कस्‍बे के दक्षिण-दक्षिण पश्चिम में स्थित है। प्राचीन अभिलेखों में मठ-परिसर गिद्ध विहार (गृध्र विहार) के नाम से जाना जाता था और यह पहाड़ी मानमुकुट के नाम से जानी जाती थी। गुफा समूह में लगभग 40 अलग अलग उत्‍खनन हैं जिनमें कुंड या हौज शामिल नहीं हैं। ये तीन सुस्‍पष्‍ट समूहों में अवस्थित हैं जिन्‍हें निम्‍नलिखित नामों से जाना जाता है :-
(i) भीमशंकर समूह- मनमोडी पहाड़ी के दक्षिण पूर्व में एक गुफा में वर्ष 46 (सन् 124) के समय के राजा नहपान के मंत्री अयामा का एक संदाता अभिलेख है।
(ii) भीमशंकर के उत्‍तर में अम्‍बा-अम्बिका समूह, इस रूप में या इस नाम से प्रसिद्ध इसलिए है क्‍योंकि इन पर तीर्थंकरों और अम्बिका की मूर्तियों की नक्‍काशी की गई है। अम्बिका 23 वें जैन तीर्थंकर, नेमीनाथ की शासनदेवी थी।

(iii) भूतलिंग समूह, अम्‍बा अम्‍बालिका समूह के पश्चिम में 200 मीटर की दूरी पर है।

(ग) शिवनेरी गुफा समूह कस्‍बे के दक्षिण पश्चिम में स्थित है और छत्रपति शिवाजी के जन्‍म स्‍थान शिवनेरी पहाड़ी की खड़ी चढ़ाई पर भिन्‍न-भिन्‍न ऊंचाइयों पर पांच पृथक समूहों में है। इस समूह में लगभग 50 गुफाएं हैं और इनमें से अधिकांश छोटी और समतल हैं।

(घ) लेण्याद्रि या गणेश लेणा समूह

लेण्याद्रि या गणेश लेणा समूह मुख्‍य समूह है जो जुन्नार के 4 कि.मी. उत्‍तर में कुकड़ी नदी की दूसरी ओर स्थित है। इस पहाड़ी को सुलेमान पहाड़, गणेश पहाड़ आदि भिन्‍न भिन्‍न नामों से जाना जाता है। गणेश पहाड़ नाम गणेश जी की प्रतिमा की अवस्थिति के कारण है जो बाद में बनाया गया है। स्‍थलपुराण में इसे लेण्याद्रि कहा गया है और एक प्राचीन अभिलेख में इस पहाड़ी को कपिचिटा (कपिचिट्टा) का नाम दिया गया है। इस समूह में लगभग 40 गुफाएं हैं और इनमें से 30 गुफाओं का मुख्‍य समूह एक पंक्ति और एक ही खंड में पूर्व से पश्चिम तक अवस्थित है और इन सबका मुख दक्षिण की ओर है तथा ये कुकड़ी नदी घाटी के ऊपर हैं।

गुफाओं को पूर्व से पश्चिम की ओर संख्‍या दी गई है और इनमें गुफा-6 और 14 चैत्यगृह हैं और शेष गुफाएं विहार (बौद्धमठ) हैं। इनमें से गुफा संख्या-7 सबसे बड़ी है और इसमें गणेश की प्रतिमा भी है। शेष बौद्ध मठ आकार में छोटे हैं और इनमें दो या तीन प्रकोष्‍ठ हैं। कुछ में आगे की ओर बरामदे भी हैं। इनका काल पहली शताब्‍दी ई. से तीसरी शताब्‍दी ई. है। गुफा संख्या-6 लेण्याद्रि गुफा समूह का मुख्‍य चैत्यगृह है। यद्यपि ये गुफाएं छोटे आकार या आयाम की हैं तथापि जब इनकी तुलना अजंता, करला, भाजा, बेदसा आदि गुफाओं से की जाती है तो हीनयान चैत्यगृह के आरंभिक उदाहरणों के रूप में ये महत्‍वपूर्ण हैं। निर्माण योजना की दृष्टि से देखें तो चैत्यगृह में एक स्तंभयुक्‍त बरामदा है और एक गजपृष्ठीय हॉल है जो सोलह स्तंभो की पंक्ति द्वारा एक केंद्रीय भाग और पार्श्‍व गलियारों में बंटा हुआ है। हॉल की लंबाई 13.3 मीटर, चौड़ाई 6.7 मीटर और ऊंचाई 7.6 मीटर है। हॉल से पहले स्तंभो से युक्‍त एक बरामदा है और इसमें प्रवेश के लिए एक समतल और विशाल प्रवेश द्वार है जो 1.8 मीटर चौड़ा और 2.7 मीटर ऊंचा है। स्‍तूप पीछे की ओर स्थित है और इसमें एक ड्रम है जिसके नीचे एक गढ़त है और ऊपर एक रेलिंग है। एक गोलाकार गुम्‍बद है और एक टोडेदार गुम्‍बद है जिसके आधार में एक रेलिंग है। दूसरी शताब्‍दी के एक संदाता अभिलेख में इसे कल्‍याण (मुम्‍बई के निकट आधुनिक कल्‍याण) के एक निवासी के उपहार के रूप में बताया गया है।

गुफा संख्या-7 एक विशाल विहार है और जुन्नार का सबसे बड़ा उत्‍खनन है। यह गुफा, गुफा संख्या-6 के दायीं ओर उसके पश्चिम में स्थित है। निर्माण योजना की दृष्टि से विहार में एक बड़ा कक्ष है जिसके तीनों ओर प्रकोष्‍ठ हैं और इसमें एक स्तंभ युक्‍त बरामदे से होकर एक केंद्रीय द्वार से प्रवेश किया जा सकता है और बरामदे तक जाने के लिए सीढियां हैं। केंद्रीय द्वार के दोनों ओर एक-एक खिड़की है। इस हॉल की लंबाई 17.37 मीटर, चौड़ाई 15.54 मीटर और ऊंचाई 3.38 मीटर है और इसमें पलस्‍तर तथा चित्रकारी के अवशेष मौजूद हैं। यहां कुल 20 प्रकोष्‍ठ हैं जिनके क्षेत्रफल भिन्‍न-भिन्‍न हैं। 7 प्रकोष्‍ठ दोनों पार्श्‍व दीवारों में है और 6 प्रकोष्‍ठ पीछे की दीवार में हैं। पीछे की दीवार के दो केंद्रीय प्रकोष्‍ठों को बाद में एक ही प्रकोष्ठ बना दिया गया और वर्तमान में पूजा के लिए गणेश जी की एक मूर्ति प्रतिष्ठित है। बरामदे में छह स्तंभ हैं और दो भित्ति-स्तंभ हैं और इसकी उठान में एक अष्‍टकोणीय शाफ्ट है जो बेंचों और पीठ के ऊपर अवस्थित है और जिसके शीर्ष पर एक औंधा घट है, दो वर्गाकार प्‍लेटों के बीच अमलक’ है, उल्टा सीढ़ीदार पिरापिड है और अंतत: जानवरों की अलंकृत आकृतियों से सजे ब्रेकेट वाला मुकुट है। स्तंभ एक प्रस्‍तरपाद को सहारा देते हैं जिसमें से छज्‍जे निकलते हैं जो धरनों और शहतीरों पर टिकी रेलिंग के साथ उभारे गए हैं।

गुफा संख्या-14 भी एक चैत्यगृह है जिसकी छत सपाट है और उसमें कोई स्तंभ नहीं है। इसकी निर्माण योजना में एक हॉल, स्तंभो से युक्‍त एक बरामदा है। हॉल की लंबाई 6.75 मीटर, चौड़ाई 3.93 मीटर और ऊंचाई 4.16 मीटर है। स्‍तूप का आधार व्‍यास 2.6 मीटर है और यह पीछे की ओर स्थित है और इसका तीन सीढियों वाला एक आधार है। किनारे को रेलिंग पैटर्न से सजाया गया है जिसके बाद एक बेलनाकार ड्रम, रेलिंग पैटर्न से युक्‍त एक वर्गाकार हर्मिका और एक औंधा सीढ़ीदार पिरामिडीय शीर्षफलक है। यहां छत पर छतरी’ उकेरी गई है। बरामदे के स्तंभों में अष्‍टकोणीय शाफ्ट हैं जो एक सीढ़ीदार पीठिका के ऊपर एक घट’ पर टिके हैं और शीर्ष पर एक औंधा कलश है, टोडेदार शीर्षफलक है। स्तंभ प्रस्‍तरपाद को सहारा देते हैं जो लकड़ी की कड़ियों जैसे दिखाई देते हैं मानो छज्‍जों को सहारा दे रही हों। बरामदे के पीछे की दीवार पर एक संदाता अभिलेख है जो दूसरी शताब्‍दी की लिपि में है।

इस गुफा समूह से लगभग 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित छोटी गुफाओं के एक अन्‍य पृथक समूह में एक और चैत्यगृह अवस्थित है।

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