"There shall be no entry in Raigad Fort, Raigad, Maharashtra from 3rd to 6th December, 2021 during the visit of Hon'ble President of india on 6th December, 2021""Internship Programme in Archaeological Survey of India-reg."

टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-राजस्‍थान कुम्‍भलगढ़ किला

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कुम्‍भलगढ़ (अक्षांश 25° 09′ उ; रेखांश 73° 36′ पू.) राजसमंद जिले की केलवाड़ा तहसील में स्‍थित है। यह उदयपुर के उत्‍तर-पश्‍चिम में लगभग 80 कि.मी. दूर अरावली पहाड़ियों के बीच स्‍थित है। सामरिक महत्‍व के कारण इसे राजस्‍थान के द्वितीय महत्‍वपूर्ण किले का स्‍थान दिया जाता है। इसके निर्माण का श्रेय राणा कुम्‍भा को जाता है जिन्‍होंने 1443 से 1458 के बीच प्रसिद्ध वास्‍तुकार, मंडन के पर्यवेक्षण में इसका निर्माण करवाया। ऐसा विश्‍वास है कि इस किले का निर्माण प्राचीन महल के स्‍थल पर करवाया गया जो ईसा पूर्व दूसरी शताब्‍दी के जैन राजकुमार, सम्‍प्रति से संबद्ध रहा था।

उस समय के प्रसिद्ध भवन निर्माणकर्ता, राणा फतेह सिंह (1885-1930 ई.) ने किले के भीतर बादल महल का निर्माण करवाया। किले के भीतर महत्‍वपूर्ण भवनों में बादल महल, कुंभा महल, हिन्दू तथा जैन मंदिर, जलाशय, बावड़ियां, छतरियां आदि हैं।

किले के भीतर महत्‍वपूर्ण स्‍मारकों का संक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार है:

प्रवेश द्वार

किले में प्रवेश दक्षिण से अरेट पोल के नाम से प्रसिद्ध द्वार से होता है जिसके पश्‍चात् हल्‍ला पोल, हनुमान पोल, राम पोल तथा विजय पोल के नाम से प्रसिद्ध द्वार हैं। हनुमान पोल महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि इसमें हनुमान की एक प्रतिमा है जिसे राणा कुम्‍भा मांडवपुर से लाए थे। शिखर पर भव्‍य परिसर में तीन द्वारों नामत: भैरों पोल, नीम्‍बू पोल तथा पाघड़ा पोल से गुजर कर प्रवेश किया जाता है। पूर्व में एक और द्वार है जिसे दानीबट्टा के नाम से जाना जाता है। यह द्वार मेवाड़ क्षेत्र को मारवाड़ से जोड़ता है।
गणेश मंदिर गणेश मंदिर का निर्माण महाराणा कुम्‍भा के समय में करवाया गया तथा यह महलों की ओर जाने वाली सड़क के साथ स्‍थित है। चित्‍तौड़गढ़ किले के कीर्तिस्‍तंभ के एक उत्‍कीर्ण लेख के अनुसार राणा कुम्‍भा ने इस मंदिर में गणेश की मूर्ति प्रतिष्‍ठित करवाई थी।

वेदी मंदिर

किले के पूरा हो जाने के पश्‍चात् धार्मिक अनुष्‍ठान करवाने के लिए वर्ष 1457 में राणा कुम्‍भा द्वारा वेदी मंदिर का निर्माण करवाया गया। यह भवन दो मंजिला है तथा इसे एक ऊंचे चबूतरे पर स्‍थापित किया गया है। यह मंदिर पश्‍चिमोन्‍मुखी है। यह नक्‍शे में अष्‍टभुजाकार है जिसके 36 स्तंभ गुम्‍बदनुमा छत को सहारा देते हैं। देवियों को समर्पित एक मंदिर इस मंदिर के पूर्व में स्‍थित है।
नीलकंठ महादेव मंदिर

वेदी मंदिर के पूर्व में स्‍थित यह मंदिर 1458 में बनवाया गया था तथा इसके गर्भगृह में एक शिव लिंग है। यह एक ऊंचे उठे हुए चबूतरे पर निर्मित है जहां पश्‍चिम से सीढ़ियों द्वारा पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर में एक गर्भगृह तथा चारों ओर स्तंभों वाला एक खुला मंडप है। गर्भगृह सर्वतोभद्र है जिसमें प्रवेश चारों दिशाओं से है। पश्‍चिमी द्वार के बाएं स्तंभ पर प्रस्‍तर उत्‍कीर्ण लेख में राणा द्वारा इसके जीर्णोद्धार का उल्‍लेख है।

पार्श्‍वनाथ मंदिर

नरसिंह द्वारा इस मंदिर का निर्माण विक्रमी सम्‍वत् 1508 (1451 ई.) में करवाया गया। इसमें जैन तीर्थंकर, पार्श्‍वनाथ की तीन फुट ऊंची प्रतिमा है।
बावन देवी मंदिर

इस प्रसिद्ध जैन मंदिर का नाम मुख्‍य मंदिर के आसपास एक ही अहाते में निर्मित बावन मंदिरों के कारण पड़ा है। इस समूह के बड़े मंदिर में एक देव मंदिर, अन्‍तराल तथा एक खुला मंडप है। मुख्य प्रवेशद्वार के ललाटबिम्‍ब पर जैन तीर्थंकर की एक मूर्ति उकेरी हुई है। छोटे मंदिरों में कोई मूर्ति नहीं है।
गोलेराव मंदिर समूह

गोलेराव मंदिर समूह, बावन देवी मंदिर के साथ स्‍थित है तथा इसमें नौ देव मंदिर हैं जो एक गोलाकार दीवार से घिरे हुए हैं। इन मंदिरों के बाहरी भाग देवताओं तथा देवियों की सुन्‍दर नक्‍काशीदार मूर्तियों से सुसज्‍जित हैं। वास्‍तुकला के आधार पर यह समूह राणा कुम्‍भा के समय का माना जा सकता है। एक मूर्ति पर विक्रमी सम्‍वत् 1516 (1459 ई.) का उत्‍कीर्ण लेख है तथा इसमें किसी गोविंदा का उल्‍लेख है।
मामादेव मंदिर

यह मंदिर कुम्‍भा श्‍याम के नाम से भी जाना जाता है तथा इसमें समतल छत वाला गर्भगृह तथा स्‍तंभों वाला एक मंडप है। कुम्‍भलगढ़ के विस्‍तृत इतिहास का ब्‍यौरा देते हुए राणा कुम्‍भा का एक उत्‍कीर्ण लेख इस मंदिर पर लगाया गया है। इस मंदिर के परिसर से देव तथा देवियों की नक्‍काशीदार मूर्तियां बड़ी संख्‍या में प्राप्‍त हुई हैं।
पीतलिया देव मंदिर

पूर्वोन्‍मुखी यह जैन मंदिर किले के उत्‍तरी हिस्‍से में स्‍थित है। पीतलिया जैन सेठ द्वारा विक्रमी सम्‍वत् 1512 (1455 ई.) में उठी हुई नींव पर बनवाए गए इस मंदिर में स्‍तंभ वाला सभा मंडप तथा एक देव मंदिर है जिसमें चारों दिशाओं से प्रवेश हो सकता है। जंघा को अप्‍सराओं तथा नर्तकों की मूर्तियों के अलावा, देव तथा देवियों के चित्रों से सजाया गया है।
कुम्‍भा महल

राणा कुम्‍भा का महल पगड़ा पोल के निकट स्‍थित है। यह महल दो मंजिला भवन है। जिसमें दो कक्ष, बीच में एक बरामदा तथा खुली जगह है। कमरों में पत्‍थर के झरोखे तथा खिड़कियां हैं।
महाराणा प्रताप का जन्‍म स्‍थान

झलिया का मलिया या रानी झलिया का महल के नाम से विख्‍यात हवेली पगड़ा पोल के निकट स्‍थित है। ऐसा माना जाता है कि यही वह महल है जहां महाराणा प्रताप का जन्‍म हुआ था। यह अनगढ़े पत्‍थरों से निर्मित सादी दीवारों तथा समतल छत वाला महल है। चित्रकारी के अवशेष अभी भी दीवारों पर देखे जा सकते हैं।
बादल महल

किले के सबसे ऊंचे स्‍थान पर बादल महल स्‍थित है। इसका निर्माण राजा फतेह सिंह (1885-1930) द्वारा करवाया गया था। यह दो मंजिला संरचना है जिसे दो भागों अर्थात् जनाना महल और मर्दाना महल में विभाजित किया गया है। यह महल भित्‍ति चित्रों से सुसज्‍जित है। जनाना महल में पत्‍थर की जालियाँ लगी हैं जिनसे रानियां राजदरबार की कार्रवाई और अन्य कार्यक्रम देखा करती थीं।

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