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Karla Caves

टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-महाराष्ट्र
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करला आंरभिक शैलकृत स्‍थापत्य कला का एक सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण केंद्र है और इसकी ओर विद्वानों और आम आदमी का ध्‍यान समान रूप से गया है। जब इस गुफा समूह की तुलना अजंता और एलोरा के साथ के गुफा समूहों से की जाती है तो यह शिला-उत्‍खनन समूह उनकी तरह परिपक्व नहीं है। तथापि करला का विशाल चैत्‍यगृह, भारत के सभी चैत्‍यगृहों में से सबसे बड़ा और सबसे विशाल है। करला के गुफा-समूह में 16 शैलकृत उत्‍खनन शामिल हैं जिनमें गुफा सं. 8 चैत्यगृह है जिसका निर्माण सातवाहनों के शासन काल के दौरान कराया गया था।

करला पुणे के मवाल तालुक में पुणे-मुम्‍बई राजमार्ग पर, पुणे के लगभग 60 कि॰मी. उत्‍तर-पश्चिम में स्थित है। करला की अवस्थिति इसकी प्रचुर और भरपूर सजावट के कारण भी महत्‍वपूर्ण है। यह कल्‍याण और सोपार के समुद्री पत्‍तनों को देश के भीतरी भागों में स्थित नगरों के साथ जोड़ने वाले प्राचीन राजमार्ग पर है। बौद्ध गतिविधियों का अन्‍य निकटतम केंद्र भाजा है जो करला के 8 कि॰मी. दक्षिण में है। इंद्रयाणी घाटी के उत्‍तरी पार्श्‍व पर पहाडियों की श्रंखला के उच्‍च स्‍कंध पर लगभग 100 मीटर की ऊंचाई पर इन गुफाओं का उत्खनन किया गया था। चैत्यगृह सर्वाधिक विशिष्‍ट है और इसलिए यह शेष उत्खननों में प्रमुख है। चैत्यगृह के समक्ष एक चौड़ा सपाट स्‍थान है जो बौद्ध धर्म के अनुयायियों की सभाओं के लिए एक आदर्श स्‍थल रहा होगा। यह चौड़ी भूमि नीचे दक्षिण की ओर जाकर संकरी हो जाती है और लगभग एक उठे हुए किनारे वाला रास्‍ता बन जाता है जो पूर्व की ओर मुड़ता है और पहाड़ी की चोटी तक जारी रहता है। इस उठे हुए किनारे वाले मार्ग के निकट कुछ अलग-थलग उत्खनन भी देखे जा सकते हैं।

करला स्थित बौद्ध विहारों का काल लगभग 60-40 ईसा पूर्व और चौथी शताब्‍दी ईसवी के बीच निर्धारित किया जा सकता है। महायान चरण के तीन उत्खननों के अलावा, शेष उत्खनन हीनयान चरण के हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि करला के संपूर्ण बौद्ध विहार परिसर की परिकल्‍पना एकल डिजाइन के रूप में की थी। गुफाओं का उत्खनन दान-राशियों से और विभिन्न व्‍यक्तियों द्वारा करवाया गया था। इसमें महार‍थी परिवार का एक राजकुमार, व्यापारी और व्यापारियों के शिल्पिसंघ, भिक्षु और भिक्षुणियां तथा पुरुषों और महिलाओं सहित आम भक्त शामिल थे। व्‍यवहारिक तौर पर समाज के प्रत्‍येक वर्ग के व्‍यक्तियों ने इस परिसर की स्‍थापना में योगदान दिया जिससे बौद्ध समाज में इसके महत्‍व का पता चलता है। यहां पाए गए विभिन्‍न अभिलेख विभिन्‍न स्थानों जैसे वेजाम्‍ती (बनवासी, उत्‍तरी कनड़ जिला, लगभग 600 किमी. करला के दक्षिण में); सोपारा (करला के उत्‍तर- पश्चिम में लगभग 100 कि॰मी.) और उमेहनाकट और धेनुकाकट के अज्ञात कस्‍बों के 27 व्‍यक्तियों के नामों को स्‍पष्‍ट रूप से उल्लेख करते हैं। धेनुकाकट के अधिकांश दानकर्ता यवन थे।
उसवदता और वसिष्‍ठीपुत्र पुलुमवी के अभिलेखों में वेलुरक संघ को भूमि दान करने का उल्‍लेख है। पुलुमवी के अभिलेख का काल उसके शासान काल का 24 वां वर्ष (सन् 154) निर्धारित किया गया है। अत: इन अभिलेखों में करला का पुराना नाम वेलुरक’ बताया है।

करला का चैत्यगृह पूरे भारत में अपनी तरह का सबसे बड़ा चैत्यगृह है। यह हॉल दरवाजे से पीछे तक 37.87 मीटर गहरा; 13.87 मीटर चौड़ा और 14.02 मीटर ऊंचा है। जब कोई व्‍यक्ति आगे से पीछे की ओर जाता है तो आयामों में थोड़ा अंतर देखने को मिलता है जो शायद हॉल की गहराई बढ़ाने के लिए जान बूझकर कर किया गया था। चैत्‍य में एक गजपृष्ठीय हॉल है जिसमें सामने की ओर बरामदा है। गजपृष्ठीय हॉल, स्तंभो की दो पंक्तियों द्वारा मध्‍यभाग और दो गलियारों में विभक्‍त है। ये पंक्तियां स्‍तूप के पीछे एक अर्धवृत्‍त में मिलती हैं और इस प्रकार अर्धवृत्तकक्ष बनता है। स्तंभों का निर्माण अत्‍यधिक कुशलता और मजबूती से किया गया है जो उस अवधि की मूर्तिकला को दर्शाता है। स्तंभ में एक सीढ़ीदार पिरामिडीय आधार है जो एक आधान द्वारा घिरा हुआ है और इसके ऊपर एक अष्‍टकोणीय शाफ्ट है। एक औंधा फूलदान अवयव का शीर्ष है, बंद अमलक की ग्रीवा और एक औंधा सीढ़ीदार पिरामिड है जिसके ऊपर एक स्तम्भशीर्ष गुटका है जो सवारों सहित जानवरों की आकृतिओं से अंलकृत है। स्‍तूप के पीछे के स्‍तंभ जिनकी संख्‍या सात है, सादे अष्‍टकोणीय हैं और इन पर कोई सजावट नहीं है। मध्‍य भाग के प्रथम स्‍तंभ के साथ-साथ और आगे की दीवार के समानांतर चार स्तंभों की एक अनुप्रस्‍थ पंक्ति भी देखने को मिलती है। गलियारे की छत सपाट है जबकि मध्‍य भाग के स्तंभ एक साधारण प्रस्तरपाद को सहारा देते हैं जिसके ऊपर पीपाकार मेहराबी छत है जो पीछे की ओर स्‍तूप के ऊपर अर्धगुम्‍बद में समाप्‍त होती है। इस छत पर असली काष्‍ठ की वक्राकार पट्टियां और लंबाई में शहतीर लगाए गए हैं।

पूजा के लिए स्‍तूप हैं जो चैत्यगृह के पिछले सिरे पर स्थित हैं। इस स्‍तूप में एक बेलनाकार ड्रम है जो दो चरणों में ऊपर उठ रहा है। अर्ध गोलाकार गुम्‍बद, ड्रम के ऊपर उठा हुआ है जो एक घनाकार हर्मिका को और उसके ऊपर निर्मित एक सात सीढियों वाले औंधे वर्गाकार पिरामिड को सहारा देता है। पिरामिड के ऊपर एक छेद के माध्‍यम से शाफ्ट के साथ एक लकड़ी की छतरी रखी है।

चैत्यगृह में प्रवेश एक आवरण दीवार में से होता है जो बरामदे के सामने बनी हुई है जिसमें तीन प्रवेश द्वार हैं। केंद्रीय द्वार मध्‍यभाग में खुलता है और अन्‍य दो द्वार पार्श्‍व भाग के गलियारों में खुलते हैं। बरामदे की पार्श्‍व दीवारों और आवरण दीवार का भीतरी मुख, मूर्तियों से अत्‍यधिक अलंकृत हैं। बरामदे की अग्र दीवार भी बहुत अधिक सज्जित है और यह सज्‍जा दो भागों में की गई है। निचले भाग में रेलिंग पैटर्न की पंक्ति है और ऊपर छह मिथुन आकृतियां हैं जो लिंटलों के स्‍तरों तक ऊपर जा रही हैं। द्वार के ऊपर का भाग छोटी चैत्‍य खिड़कियों की श्रंखला से अलंकृत है जो विशाल चैत्‍य खिड़की की भांति दिखती हैं। ये लघु खिड़कियां एक वेदिका और एक गोल कारनिस के माध्‍यम से आपस में जुड़ी हुई हैं। यह पैटर्न हॉल के अग्रभाग की पूरी चौड़ाई में आरंभ से अंत तक मौजूद है। ऊपर उल्लिखित विशाल चैत्‍य खिड़की स्‍तूप और विराट चैत्यगृह के स्तंभों को प्रकाशित करने के लिए अच्‍छे प्रकाश स्रोत का कार्य करती है।

करला स्थित चैत्यगृह भी अद्वितीय है क्‍योंकि यह पश्चिमी दक्‍कन के दो चैत्‍यगृहों में से एक है जिसके अग्रभाग में विशाल सिंहस्‍तंभ हैं। दूसरा चैत्यगृह कान्‍हेरी में है। यह स्‍तंभ अशोक कालीन स्‍तंभों जैसा है जिसमें एक चबूतरे पर उठी हुई विशाल 16 पार्श्‍व वाली शाफ्ट है। यह शाफ्ट एक औंधी घंटी अवयव से घिरा है और उसके बाद एक सपाट सतह और पाएदार पिरामिडीय प्‍लेटें हैं। चार अलंकृत सिंह इस स्‍तंभ के शीर्ष पर आरूढ़ हैं। यह स्‍तंभ चैत्यगृह के दायीं ओर अवस्थित है। ऐसा ही स्‍तंभ इसके बायीं ओर मौजूद रहा होगा क्‍योंकि इसका साक्ष्‍य यहां छोटे से ठूंठ के रूप में देखा जा सकता है।

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