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कांगड़ा किला

kangra-fort

टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-हिमाचल प्रदेश

यह किला नगरकोट या कोट कांगड़ा के नाम से प्रसिद्घ है जो पुराने कांगड़ा नगर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और यह बाणगंगा और पाताल गंगा नदियों जो किले के लिए खाई के रूप में काम करती हैं, के संगम पर खडी पहाड़ी के शीर्ष पर बना है। यह किला बहुत प्राचीन है। इस किले के भीतर वर्तमान अवशेष जैन और ब्राह्मणवादी मंदिरों के हैं जो नौंवी-दसवीं शताब्दी ईसवी के हो सकते हैं। इतिहास के आख्यान में इसके प्रारंभिक उल्लेख, 1009 ईसवी में मोहम्मद गजनी द्वारा किए गए आक्रमण के समय के हैं। बाद में मोहम्मद तुगलक और उसके उत्तराधिकारी, फिरोजशाह तुगलक ने इस पर क्रमश: 1337 ईसवी और 1351 ईसवी में अपना कब्जा जमाया।

बाणगंगा और मांझी नदियों के ऊपर स्थित कांगड़ा, 500 राजाओं की वंशावली के पूर्वज, राजा भूमचंद की ‘त्रिगतरा’ भूमि का राजधानी नगर था। कांगड़ा का किला प्रचुर धन-संपति के भण्डार के लिए इतना प्रसिद्घ था कि मोहम्मद गजनी ने भारत में अपने चौथे अभियान के दौरान पंजाब को हराया और सीधे ही 1009 ईसवी में कांगड़ा पहुंचा। विशाल भवन जो राजाओं के लिए कभी चुनौती बने हुए थे, विशेष तौर पर सन 1905 में आए भूकंप के बाद खंडहरों में तबदील हो गए थे। इस किले के प्रवेश मार्ग को बलुआ पत्थर से निर्मित मेहराब के कब्जों से जोडे गए मोटे काष्ठ के तख्तों का एक बडा द्वार लगाकर सुरक्षित किया गया था। इसकी ऊंचाई लगभग 15 फुट है। इसका नाम रणजीत सिंह द्वार है। चट्टानों के बीच काटी गई एक खाई जो बाणगंगा और मांझी नदियों को जोड़ती है, बाहरी दुनिया से इस किले को पृथक करती है।

स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला है।

प्रवेश शुल्क:

भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 15/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य- 200/- रूपए प्रति व्यक्ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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