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हुमायूं के मकबरे का मकबरा परिसर

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हुमायूं के मकबरे का मकबरा परिसर

हुमायूँ के मृत शरीर को दफनाने को लेकर कई मत हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि उसके मृत शरीर को पहले पुराने किले में दफनाया गया था। बाद में सन् 1556 में हेमू द्वारा किए गए हमले के कारण सरहिंद में अस्‍थायी मकबरे में दफनाया गया तथा जब अकबर ने हेमू को पराजित किया तो हुमायूँ का मृत शरीर पुन: दिल्‍ली लाया गया और शेर मंडल में दफनाया गया। अंतत: हुमायूँ की बेगम और विधवा, हाजी बेगम द्वारा 1572 में मकबरा निर्मित करवाने के बाद मौजूदा स्‍थान पर दफना गया। मकबरे के निर्माण पर 15 लाख रुपए की अनुमानित लागत आई थी। हुमायूँ का मकबरा मुगलों की प्रमुख भवन-निर्माण गतिविधियों के आरंभ को दर्शाता करता है.।

भवन-निर्माण शैली फारसी वास्‍तुकला और भारतीय भवन निर्माण शैलियों का मिश्रण है। सफेद संगमरमर के साथ लाल बलुआ पत्‍थरों के उचित मिश्रण वाले भवन निर्माण माध्यम का प्रयोग इस शैली की परिपक्‍वता को दर्शाता है जिसमें संगमरमर का प्रयोग नक्‍काशी कार्यों के रूप में हुआ। मकबरों में लाल बलुआ पत्‍थरों और सफेद संगमरमर का इस प्रकार का मिश्रण निरपवाद रूप से 13 वीं शताब्‍दी ई. की दिल्‍ली सल्‍तनत की स्‍थापत्‍य-कला में देखा जा सकता है। आंरभिक उदाहरण बेशक अलाई दरवाजा है जिसमें लाल बलुआ पत्‍थर की पृष्‍ठभूमि में सफेद संगमरमर की अति सुंदर सजावट की गई है। मुगलों ने सजावटी वास्‍तुकला की इस शैली को पुन: अपनाया और एक अर्थ में इस निर्माण तकनीक को पुनर्जीवित किया। अन्‍य भवन, जिनमें सजावट की इस शैली का प्रयोग किया गया था, में जमाली-कमाली मस्जिद (लगभग) 1528-1529), किला-ए-कुहना मस्जिद (सन् 1541) और अतगा खान का मकबरा (लगभग 1566-67) शामिल हैं।

हुमायूँ का मकबरा एक विशाल उद्यान परिसर के केंद्र में स्थित है। उद्यान परिसर मुख्‍यत: चार भागों में विभक्‍त है जो आगे अनेक वर्गाकार भागों में उप-विभाजित है (यह मुगल-चार-बाग का विशिष्ट उदाहरण है)। इसमें नियमित अंतराल पर सेतुक, जल प्रणाल और जलमंडप हैं। मकबरा परिसर अनगढ़े पत्‍थरों से बनी एक ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। इसमें प्रवेश करने के लिए पश्‍चिम और दक्षिण में दो प्रवेशद्वार हैं। दक्षिण दिशा वाला द्वार अब बंद है। दक्षिणी द्वार लगभग 15.5 मीटर ऊंचा है और इसमें एक केंद्रीय अष्‍टकोणीय हॉल है जिसके दोनों ओर आयताकार कक्ष हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के प्रथम तल पर वर्गाकार और अंडाकार कक्ष हैं। बाहर की ओर द्वार के दोनों ओर जालीदार दीवारें हैं जिनमें चापाकार आले हैं। दक्षिणी प्रवेश मार्ग के ठीक पश्‍चिम में एक अहाता है जिसका क्षेत्रफल 146 मीटर X 32 मीटर है और जो अहाता दीवार के बाहरी तरफ के सामने है। यह भवन नीची छत वाला है जिसमें 25 चापित प्रवेश मार्ग हैं। यह शाही मकबरे के परिचरों के रहने के लिए बनाया गया था। पास ही में एक अन्‍य भवन स्थित है जो उक्‍त अहाते सहित बाद में बनाया गया है। इस समय पश्‍चिमी द्वार का प्रयोग यहां आने वाले लोगों द्वारा मकबरे के परिसर में प्रवेश करने के लिए किया जाता है। दक्षिणी द्वार की तुलना में पश्‍चिमी द्वार छोटा है और 7 मीटर ऊंचा है तथा दो मंजिला है।

चारदीवारी की उत्‍तरी, दक्षिणी और पश्चिमी दीवारें अनगढ़े पत्‍थरों से बनी हैं और इसके भीतरी मुख पर खांचेदार मेहराब हैं। पूर्वी दिशा की ओर अहाता दीवार की ऊंचाई कम है और मूलत: इसका उपयोग यमुना नदी तक पहुंचने के लिए किया जाता था जो निकट ही बहती थी।

यह मकबरा एक विशाल और ऊंचे चबूतरे पर बना है जिसकी ऊंचाई 6.5 मीटर है। इसके अग्रभाग को चारों पार्श्‍वों के मध्य में एक-एक-चार प्रवेश सीढियों को छोड़कर, सभी चारों पार्श्‍वों पर चापित द्वारों की एक श्रृंखला द्वारा उभारा गया है। चारों पार्श्‍वों में 17-17 चापित द्वार हैं और खांचेदार कोने हैं। चापित द्वार तथा खांचेदार कोने पूरे स्मारक को एक सुंदर रूप प्रदान करते हैं।

हुमायूँ के मकबरे में निर्माण में तीन प्रकार के पत्‍थरों अर्थात् लाल बलुआ पत्‍थर, सफेद संगमरमर और स्फटिकाश्म का प्रयोग किया गया है। परिवेष्‍टक दीवारें तथा दो प्रवेश द्वारों में बलुआ पत्‍थर की सज्जा और संगमरमर द्वारा सजावट के काम के साथ ये स्‍थानीय स्फटिकाश्म से निर्मित हैं। मुख्‍य मकबरे के चबूतरे की सीढियां भी स्फटिकाश्म से सज्जित हैं। दिल्‍ली की पहाडियों में स्फटिकाश्म स्‍थानीय रूप से उपलब्‍ध है जबकि लाल बलुआ पत्‍‍थर आगरा के निकट तांतपुर की खानों से और सफेद संगमरमर राजस्‍थान की प्रसिद्ध मकराना की खानों से आया था।

ऊंचे उठे चबूतरे के चारों पार्श्‍वों के केंद्र में ऊपर जाती सीढियां एक खुली छत पर जाती हैं जिसके केंद्र में मुख्‍य मकबरा स्थित है। मुख्‍य मकबरा स्‍मारक के नीचे स्थित है और इस तक दक्षिणी सीढ़ी के पूर्व में समस्तरीय मार्ग द्वारा जाया जाता है। चबूतरे के चापित द्वारों में अनेक विविध मकबरे हैं।

वास्‍तु-योजना में मुख्‍य मकबरा अष्‍टकोणीय है और दो मंजिला है। अष्‍टभुज के चार विकर्ण कोनों पर चार कक्ष हैं जिनमें हुमायूँ के परिवार के सदस्‍यों के अनेक मकबरे भी हैं। अष्‍टकोणीय मकबरे पर दो गुम्‍बद हैं जिन्‍हें बगली डाटों द्वारा सहारा दिया गया है। किसी मकबरे में दोहरे गुम्‍बद का प्रयोग यहां पहली बार देखा गया है और इससे निर्माता को अत्‍यधिक ऊंचाई वाला प्रभावशाली भवन बनाने में मदद मिली है जिसमें बाहर की ओर दोहरे गुम्‍बदों की मौजूदगी को युक्तिपूर्वक प्रच्‍छन्‍न रखा गया है। बाह्य ऊंचाई इसे प्रभावशाली बनाती है जबकि निचले गुम्‍बद की नीची छत आंतरिक बनावट को एक आनुपातिक ऊंचाई देती है। दोहरे गुम्‍बद निर्मित करने का तरीका इस काल के दौरान पश्‍चिम एशिया में पहले से ही प्रचलित था जिसे यहां हुमायूँ के मकबरे में पहली बार प्रयोग किया गया।

इस मकबरे का गुम्‍बद भी इस अर्थ में अपने आप में संपूर्ण गुम्‍बद है कि दूसरी ओर से भी पूर्ण होने पर यह पूर्ण वृत्‍त बनाता है। गुम्‍बद की रूपरेखा एक पूर्ण अर्धवृत्‍त बनाती है और इस प्रकार यह गुम्‍बद वास्‍तुकला की आंरभिक विविधताओं से स्‍पष्‍ट रूप से भिन्‍न है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, मुख्‍य मकबरा दो मंजिला है और तीन स्तरों में दिखाई देता है। निचले स्तर में अष्‍टकोणीय आठ चापित द्वार हैं जिनके ऊपर छज्‍जेदार चापित द्वार हैं और इनके ऊपर आंतरिक गुम्‍बद का अंत:स्तर है जो लाल बलुआ पत्‍थर की जालियों से अलंकृत है। मुख्‍य मकबरे का भीतरी भाग भी विभिन्‍न प्रकार के पत्‍थरों और किनारों पर जड़ाऊ सजावटी पेटर्नों के रूप में सफेद संगमरमर से उभारा गया है। लाल बलुआ पत्‍थर से की गई जाली की सजावट इसके निचले स्‍तर पर स्थित मध्‍य में चापित द्वारों पर देखी जा सकती है।

मकबरे की बाहरी चाप पर व्‍यापक रूप से लाल बलुआ पत्‍थर से निर्मित भवन के विपरीत, सफेद संगमरमर पत्थरों का मुल्लमा चढ़ाया गया है। यह गुम्‍बद आकार में बल्बनुमा है; रूपरेखा को मुख्‍य गुम्‍बद के साथ-साथ चार कोनों पर छोटे मंडपों से उभारा गया है।

हुमायूँ का मकबरा अंतिम मुगल शासक, बहादुरशाह द्वितीय ‘’जफर’’ को तीन राजकुमारों- मिर्जा मुगल, मिर्जा खिजार सुलतान और मिर्जा अबूबकर सहित लेफ्टीनेंट विलियम हडसन द्वारा सन् 1857 में बंदी बनाने की घटना से भी जुड़ा हुआ है। मुगल शासक को उसके राजकुमारों सहित हडसन ने 22 सितंबर, 1857 को बंदी बना लिया था।

हुमायूँ मकबरा परिसर में कई अन्‍य उल्‍लेखनीय भवन भी हैं जो हुमायूँ से पूर्व और बाद के काल की स्‍थापत्‍यकला के उदाहरण हैं। इनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं:-

नाई का मकबरा;- यह मकबरा उद्यान परिसर में दक्षिण-पूर्वी कोने में स्थित है। यह मकबरा 1590-91 ई. का है जैसा कि भीतर मिले एक अभिलेख से ज्ञात होता है। इस मकबरे में किस व्‍यक्ति को दफनाया गया है, यह ज्ञात नहीं है। इस मकबरे का स्‍थानीय नाम ‘नाई का मकबरा’ है।

नीला गुम्‍बद:- यह स्‍मारक पूर्वी परिवेष्‍टक दीवार के बाहर स्थित है जिसे नीले रंग के गुम्‍बद के कारण स्‍थानीय रूप से नीला गुम्‍बद के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहां अब्‍दुर रहीम खाने-खानां के परिचर, फहीम खान के अवशेष दफन हैं जो अकबर और जहांगीर के शासन काल के प्रभावशाली दरबारी थे।

चिल्‍ला निजामुद्दीन औलिया:- यह भवन मकबरे के उत्‍तर-पूर्वी कोने के बाहर स्थित है और तुगलक शैली में है। ऐसा माना जाता है कि यह भवन शेख निजामुद्दीन औलिया का निवास स्‍थान हुआ करता था जिनकी मृत्‍यु 1325 ई. में हुई थी।

अफसरवाला मस्जिद:- यह मस्जिद मुख्‍य मकबरे के पश्चिमी द्वार के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। इस भवन का निर्माण काल, स्‍थापत्‍य शैली के अधार पर 1560 से 1567 के बीच माना जाता है।

अफसरवाला मकबरा:- यह मकबरा अफसरवाला मस्जिद के साथ है और एक अज्ञात मकबरा है। मकबरे के भीतर की संगमरमर की कब्र पर 1566-67 ई. की तारीख अंकित है।

अरब-सरकार:- इस सराय का निर्माण हुमायूँ की विधवा, हाजीबेगम ने 1560-61 में तीन सौ अरब-मुल्‍लाओं के रहने के लिए करवाया था। ऐसा कहा जाता है कि वह उन्हें मक्‍का की अपनी तीर्थयात्रा से अपने साथ लायी थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस भवन में फारसी कारीगर और शिल्‍पी रहते थे जो वास्‍तव में हुमायूँ के मकबरे के निर्माण कार्य में लगे हुए थे। यह सराय अफसरवाला मस्जिद के बगल में स्थित है।

बू-हलीमा का बाग:- हुमायूँ के मकबरे के परिसर में प्रवेश करने वाले आंगतुक पहले एक उद्यान परिसर में प्रवेश करते हैं जिसे बू-हलीमा उद्यान कहा जाता है। तथापि, यह नाम कैसे पड़ा, यह ज्ञात नहीं है। उद्यान शैली के आधार पर यह आंरभिक मुगल काल का माना जा सकता है।

ईसा खान का मकबरा और मस्जिद:-ईसा खान का मकबरा और मस्जिद बू-हलीमा उद्यान के दक्षिण में स्थित है। लाल बलुआ पत्‍थर की एक स्‍लैब पर खुदे अभिलेख से यह पता चलता है कि यह मकबरा ईसा खान का है। इसका निर्माण शेरशाह के पुत्र, इस्‍लामशाह के शासन काल के दौरान 1547-48 ई. में हुआ था।

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