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हुमायूं के मकबरे का परिचय

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हुमायूं के मकबरे का परिचय

भारत में मुस्लिम शासन का आगमन रीति-रिवाजों, प्रथाओं और एक नई स्‍थापत्‍य शैली के एक नए चरण की शुरूआत थी। 1192 ई. में मुहम्‍मद बिन सैम ने तराईन (तरावड़ी) की लड़ाई में राजपूत शासक, पृथ्‍वीराज चौहान को पराजित किया और इसी से दिल्‍ली में सुल्‍तानों के शासन की शुरूआत हुई। विजय प्राप्‍त करने के बाद, मुहम्‍मद ने शासन को अपने गुलाम, कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथों में सौंप दिया जो दिल्‍ली में गुलाम वंश का पहला शासक था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ई. में मुहम्‍मद गौरी की मृत्‍यु के बाद दिल्‍ली के शासक के रूप में अपनी पहचान बनाई

गुलाम वंश के पास सत्ता आने के बाद मुसलमान शासकों ने विभिन्‍न राजवंशजों के अधीन लगभग सात सदियों तक निरंतर शासन किया। भारत में राजधानी के रूप में दिल्‍ली से शासन करने वाले विभिन्‍न राजवशंज इस प्रकार हैं:-

1.गुलाम या मामलुक राजवंशज जिसमें बलबन और उसके उत्‍तराधिकारी शामिल हैं- 1206 – 1290 ई.
2.खालजी राजवशंज- 1290 – 1321 ई.
3.तुगलक राजवंशज- 1321 – 1414 ई.
4.सैय्यद राजवंशज- 1414 – 1444 ई.
5.लोदी राजवंशज-1452 – 1526 ई.
6.मुगल राजवंशज- (मुगलों का शाही शासन 1707 ई. में औरंगजेब के शासन के साथ कमजोर हो गया था).)

(a) बाबर(1526-1530 ई.)

(b) हुमायूँ (1530-40; 1555-56 ई.)

(c) अकबर(1556-1605 ई.)

(d) जहॉंगीर (1605-1627 ई.)

(e) शाहजहां (1627-1658 ई.)

(f) औरंगजेब (1658-1707 ई.)

(g) बाद के मुगल शासक(1707-1857 ई.)

1526 – 1857 ई.
7.सूर राजवंशज 1540 – 1555 ई.

 

लोदी शासन के आखिरी शासक, इब्राहम लोदी (1517-26 ई.) का शासन समाप्‍त होने के दौरान संदेहात्‍मक हो गया था और वह अपने उच्‍चपदस्‍थ व्यक्तियों और यहां तक कि प्रांतीय गवर्नरों के साथ भी दुर्व्‍यवहार करने लगा था। इसके कारण इस समय के विभिन्‍न कुलीन वर्गों के बीच रोष उत्‍पन्‍न हो गया। लाहौर के सूबेदार, दौलत खान जिसे दिल्‍ली के सुल्‍तान ने परेशान करके रखा था, ने बाबर को इब्राहिम लोदी पर आक्रमण करने के लिए बुलाया। बाबर का 1526 ई. में पानीपत की प्रसिद्ध पहली लड़ाई में इब्राहीम लोदी से सामना हुआ। इसी लड़ाई में इब्राहिम लोदी पराजित हुआ और मारा भी गया। इसके बाद बाबर दिल्‍ली का शासक बना और लोदी के नियंत्रणाधीन उत्‍तर भारत का विशाल भू-भाग बाबर के कब्‍जे में आ गया। दिल्‍ली पर कब्‍जा करने के बाद बाबर ने अपने पुत्र को आगरा पर नियंत्रण करने के लिए भेजा। बाबर ने आगरा और पानीपत में बाग बनवाए। इनमें से एक आगरा में है जिसे आराम बाग के रूप में जाना जाता है, लेकिन अब उसका नाम राम बाग पड़ गया है। बाबर ने भारत में अहाता उद्यानों के नए पैटर्न की शुरूआत की जिसकी प्रेरणा काबुल क्षेत्र के पर्वतीय एवं चढ़ाई वाले भू-भागों से प्राप्‍त हुई थी। बाबर ने अपने अल्‍प-शासन काल के दौरान उत्‍तर भारत के कई क्षेत्रीय साम्राज्‍यों को पराजित किया और विस्तृत इलाकों पर नियंत्रण कर लिया जो उत्‍तराधिकारियों के लिए एक मजबूत आधार साबित हुआ। बाबर को एक महान निर्माता होने का गौरव भी प्राप्त था। इनमें से कुछ इमारतें या तो स्वयं बनवाई हैं या फिर अपने संरक्षण के अंतर्गत बनवाई हैं। इनमें पानीपत में काबुली-बाग मस्जिद, संभल में जामी-मस्जिद और अयोध्‍या में एक मस्जिद शामिल है।

बाबर के बाद 1530 ई. में हुमायूँ को उत्‍तराधिकारी बनाया गया। लेकिन जल्‍द ही सूर वंश के अफगान, इब्राहीम खान के वंशज, शेरशाह से मुकाबला हो गया। हुमायूँ बिलग्राम (कन्‍नौज) के युद्ध में पराजित हुआ और 1540 में दिल्‍ली की राजगद्दी से हाथ धोना पड़ा। हुमायूँ ने ईरान मे शरण ली और लगभग 15 वर्ष तक निर्वासन में संघर्ष भरा जीवन व्यतीत किया। इसी दौरान सन् 1542 ई. में उनके बेटे अकबर का जन्‍म हुआ। हुमायूँ अंतत: 1555 ई. में उधार में ली गई पारसी सेना के साथ वापिस आया और शेरशाह सूर के पुत्र एवं उत्‍तराधिकारी, सिकंदरशाह सूर को पराजित किया।

तथापि, पुस्‍तकालय की सीढ़ियों से गिरकर 1556 ई. में ही हुमायूँ की मृत्‍यु हो गई थी। अपने पिता से उत्‍तराधिकार में प्राप्‍त क्षेत्र को एकीकृत करने पर ध्यान न दे पाने के कारण हुमायूँ का शासन काल कम रहा। अपने अल्‍पकालीन शासन के दौरान हुमायूँ ने कुछ भवन निर्माण गतिविधियां भी चलाई। 1533 ई. में यमुना नदी के दाएं किनारे पर सन् 1504 ई. में एक नए शहर, दिनपनाह की आधारशिला रखी। यह किला दस माह की अल्‍प अवधि में ही बन गया था। इमारत बनाने की सामग्री मुख्‍यतया ध्वस्त सिरी फोर्ट की अवशेष सामग्री से लाई गई। दिनपनाह के अवशेषों का अभी तक कोई पता नहीं चला है क्‍योंकि शेरशाह ने इसमें व्‍यापक रूप से परिवर्तन करके उन्हें नष्‍ट कर दिया था। हुमायूँ ने शेरशाह द्वारा आंशिक रूप से निर्मित पुराना किला को भी पूरा किया। हुमायूँ ने मेहरौली, दिल्‍ली में स्थित जमाली-कमाली मस्जिद, कच्‍चपुर, आगरा में मस्जिद आदि इमारतों के निर्माण में भी सहायता की। हुमायूँ ने पुराना किला में शेर मंडल का इस्तेमाल अपने पुस्‍तकालय के रूप में किया जहां 1556 ई. में पैर फिसलने के कारण गिरकर मृत्यु हो गई थी।

हुमायूँ के मकबरे का निर्माण 1565 ई. में उनकी ज्‍येष्‍ठ विधवा, हाजी बेगम द्वारा शुरू किया गया था। इस मकबरे का निर्माण हुमायूँ की मृत्‍यु के नौ वर्ष बाद शुरू किया गया जो सात वर्ष पश्‍चात् सन् 1572 ई. में पूरा हुआ।

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