"There shall be no entry in Raigad Fort, Raigad, Maharashtra from 3rd to 6th December, 2021 during the visit of Hon'ble President of india on 6th December, 2021""Internship Programme in Archaeological Survey of India-reg."

उत्खनित स्थल-विक्रमशिला, अंतिचक

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टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-बिहार

उत्खनित स्थल-विक्रमशिला, अंतिचक

विक्रमशिला (गांव अंतिचक, जिला भागलपुर, बिहार) भागलपुर से लगभग 50 कि.मी. पूर्व में और पूर्वी रेलवे के भागलपुर-साहिबगंज खंड पर स्थित रेलवे स्टेशन कहलगांव के उत्तर पूर्व में लगभग 13 कि.मी. दूरी पर स्थित है। यहां कहलगांव से लगभग 2 कि.मी. दूर स्थित अनादिपुर से राष्ट्रीय राजमार्ग 80 से मुड़ने वाले लगभग 11 कि.मी. लंबे मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है।

उत्खनन से प्राप्त अवशेष विक्रमशिला महाविहार के भग्नावशेषों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो 8वीं शताब्दी के अंत या 9वीं शताब्दी के प्रारंभ में पाल राजा, धर्मपाल द्वारा स्थापित प्रसिद्घ विश्वविद्यालय था। यह विश्वविद्यालय 13वी शताब्दी ईसवी के प्रारंभ में अपने पतन से पहले लगभग चार शताब्दियों तक फला-फूला। इसकी जानकारी हमें मुख्यत: तिब्बती स्रोतों, विशेषरूप से तारानाथ के लेखों से मिलती है जो 16वीं से 17वीं शताब्दी ईसवी के तिब्बती भिक्षु और इतिहासकार थे।

विक्रमशिला बौद्घ धर्म से संबंधित बड़े विश्वविद्यालयों में से एक था जिसमें 100 से अधिक अध्यापक और लगभग 1000 छात्र थे। इस विश्वविद्यालय से अनेक प्रसिद्ध विद्वानों ने शिक्षा प्राप्त की जिन्हें प्राय: बौद्घ धर्म की शिक्षा, संस्कृति और बौद्घ धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विदेशों में आमंत्रित किया जाता था। इनमें से सबसे अधिक ख्याति प्राप्त और विद्वान अतिस दीपांकर थे जिन्होंने तिब्बत में लामावाद का सूत्रपात किया। यहां धर्म, विज्ञान, दर्शन, व्याकरण, आध्यात्म, नीति आदि जैसे विषय पढ़ाए जाते थे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शाखा तंत्रविद्या का अध्यापन था।

इस स्थल का अति सावधानी पूर्वक उत्खनन सबसे पहले पटना विश्वविद्यालय (1960-69) द्वारा किया गया था और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा (1972-82) किया गया जिसमें एक बहुत बड़ा वर्गाकार महाविहार प्राप्त हुआ है जिसके मध्य में एक क्रूसाकार स्तूप, एक पुस्तकालय भवन और मनौती स्तूपों का समूह है। इस महाविहार के उत्तर में अनेक बिखरी हुई इमारतें (संरचनाएं) हैं जिसमें तिब्बती और हिन्दू मंदिर भी पाए गए हैं। यह पूरा महाविहार लगभग सौ एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है।

यह महाविहार या बौद्घ भिक्षुओं के रहने का स्थान, एक बड़ी वर्गाकार इमारत है जिसका प्रत्येक किनारा 330 मीटर का है जिसमें चारों तरफ 52-52, कुल 208 कोठरियां हैं जो एक ही बरामदें में खुलती हैं। कुछ कोठरियों के नीचे ईंटों से निर्मित चापाकार भूमिगत कक्ष देखे गए हैं जहां संभवत: भिक्षु गुप्त रूप से ध्यान करते थे।

पूजा के लिए बनाया गया मुख्य स्तूप ईंटों से बना है जिसकी चिनाई मिट्टी-गारे से की गई है और यह वर्गाकार महाविहार के मध्य में खड़ा है। दो स्तरों वाला यह स्तूप क्रूसाकार है और भूतल से लगभग 15 मीटर ऊंचा है और इस तल तक उत्तर की ओर बनी सीढि़यों से पहुंचा जा सकता है। सभी मूल चारों दिशाओं में बाहर निकले हुए कक्ष बनाए गए हैं जिनके साथ स्तंभ युक्त उपकक्ष बने हैं और सामने स्तंभ वाला एक मण्ड़प है। स्तूप के चार कक्षों में महात्मा बुद्घ की बैठी हुई मुद्रा में विशालकाय गचकारी मूर्तियां खंडित अवस्था में पाई गयी हैं। उत्तर की ओर रखी हुई एक खंडित मूर्ति में कुछ खराबी आ जाने के बाद उसके स्थान पर पत्थर की मूर्ति रखी गयी है।

दोनों स्तरों की दीवारों को सांचों और मृण्मय फलकों से सजाया गया है जो मृण्मय कला की उत्कृष्टता का प्रमाण है और जो पाल राजाओं के शासन काल (8वीं से 12वीं शताब्दी ईसवी) में फली-फूली थी।

महाविहार के दक्षिण-पश्चिमी कोने पर लगभग 32 मीटर दक्षिण में स्थित और तंग गलियारे के जरिए मुख्य महाविहार से जुड़ी एक आयताकार इमारत है जिसकी एक पुस्तकालय भवन के रूप में पहचान की गई है। यह पिछली दीवार में बने अनेक हवाकश छिद्रों के जरिए साथ लगे जलाशय के शीतल जल से वातानुकूलित रहता था। यह व्यवस्था संभवत: उत्कृष्ट पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए की गई थी।

विक्रमशिला महाविहार एवं स्तूप की वास्तुकला और पक्की मिट्टी के अलंकृत टुकड़े समकालीन पहाड़पुर (बांग्लादेश) के सोमपुर महविहार के सदृश हैं। योजना के अनुसार दोनों एक दूसरे के समान हैं, सिवाए इसके कि विक्रमशिला महाविहार बड़ा है और इसकी बाह्य दीवार किलेनुमा है।

इस स्थान के उत्खनन में बडी संख्या में विभिन्न प्रकार के पुरावशेष पाये गए हैं जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अनुरक्षित स्थानीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं।
स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला है।

प्रवेश शुल्क:-भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के आगंतुकों के लिए 15/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य:- 200/- रूपए प्रति व्यक्ति
(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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