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उत्खनित स्थल-नालंदा

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टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-बिहार

उत्खनित स्थल-नालंदा

नालंदा का पुरातत्व स्थल, नालंदा के जिला मुख्यालय, बिहार शरीफ से लगभग 15 कि.मी. दक्षिण में और बिहार राज्य की राजधानी पटना से लगभग 95 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित है जो रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा है।

नालंदा का इतिहास छठी शताब्दी ईसा पूर्व से भगवान महावीर और महात्मा बुद्घ से जुड़ा हुआ है। यह सारीपुत्र के जन्म और निर्वाण का स्थान है जो महात्मा बुद्घ का सबसे प्रसिद्घ शिष्य था। लेकिन यह स्थान पांचवी शताब्दी ईसवी में पूरे बौद्घ समुदाय में प्राच्य-कला और अध्ययन के लिए एक महान महाविहार एवं शिक्षा संस्थान के रूप में विशेष रूप से प्रसिद्घ हुआ जो सुदूर देशों के छात्रों के लिए आकर्षण का केंद्र था जिनमें चीन से आए ह्वेनसांग और इत्सिंग भी शामिल हैं। यहां धर्म, विज्ञान, व्याकरण, नीति, खगोल विज्ञान, आध्यात्मवाद और दर्शनशास्त्र जैसे विभिन्न विषय पढ़ाए जाते थे। इस संस्था को समकालीन शासकों द्वारा इस प्रयोजन के लिए विशेष रूप से प्रदान किए गए ग्रामों से एकत्रित राजस्व द्वारा चलाया जाता था जिसके अभिलेखीय साक्ष्य उपलब्ध हैं।

नालंदा महाविहार प्राचीन काल के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में से एक था जिसकी स्थापना गुप्त वंश के महान शासक, कुमार गुप्त (413-455 ईसवी में) ने की थी। इसके बाद कन्नौज के राजा, हर्ष वर्धन (606-647 ईसवी) और पूर्वी भारत के पाल राजा (8वीं से 12वीं शताब्दी ईसवी) इस केंद्र को संरक्षण प्रदान करते रहे। इस प्रसिद्ध संस्था (केंद्र) का पतन बाद के पाल राजाओं के काल में शुरू हो गया था लेकिन लगभग 1200 ईसवी में इस संस्था को अंतिम आघात लगा जब बख्तियार खालजी ने आक्रमण के दौरान इसे आग से पूरी तरह नष्ट कर दिया था और इस प्रकार नालंदा विश्वविद्यालय की ख्याति और वैभव स्माप्त हो गया। सन 1915-37 और 1974-82 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किए गए उत्खनन से ईंटों के बने छह बडे मंदिर और 11 महाविहार प्राप्त हुए हैं जो एक व्यवस्थित योजना के आधार पर थे और जो एक वर्ग किलोमीटर से अधिक के क्षेत्र में फैले हुए थे। मूल रूप से एक सौ फुट चौड़ा रास्ता पश्चिम में मंदिरों की पंक्तियों के साथ साथ उत्तर-दक्षिण तक चला जाता है जिसके पूर्व में महाविहार हैं।

ये महाविहार सामान्य विन्यास और रूप रेखा के पूर्णत: अनुरूप हैं। मध्य भाग में आंगन, एक सामान्य बरामदे के साथ चारों ओर बनी कोठरियों की पंक्ति, बहुमूल्य सामान रखने के लिए गुप्त कक्ष, ऊपरी मंजिलों पर चढ़ने के लिए सीढियां, रसोई घर, कुआं, अन्नागार, एकल प्रवेशद्वार और प्रार्थना या बैठक के लिए बने सामान्य स्थान आदि नालंदा के लगभग सभी महाविहारों की कुछ खास विशेषताएं हैं। मुख्य मंदिर संख्या-3 सबसे बड़ा है और यह मंदिर की पंक्ति के दक्षिणी किनारे की सबसे बडी और भव्य संरचना है और इसके चारों ओर मनौती स्तूप बने हुए हैं। मूल रूप से इसके चारों कोनों पर ऊंचे शिखर थे जिनमें से दो अभी भी मौजूद हैं। ये शिखर चूना-मिट्टी से निर्मित (गचकारी) बुद्ध व बोधिसत्व की प्रतिमायुक्त आलों की पंक्तियों से सुसज्जित हैं एवं गुप्तकालीन कलाशैली के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक हैं। मंदिर संख्या-2, उस मंदिर का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी विशेषताएं अलग हैं और जो अवशेषों के सामान्य विन्यास के अनुरूप नहीं है। इस मंदिर की दिलचस्प विशेषता यह है कि इसकी गढ़ी हुई प्लिंथ के ऊपर दो सौ ग्यारह मूर्तियों के फलकों का अलंकरण है। महाविहार परिसर के निकट ‘सराय टीला’ नामक एक अन्य टीले में मंदिर के अवशेष मिले हैं जिसमें भित्ति-चित्र और महात्मा बुद्घ की विशालकाय गचकारी मूर्ति के पांवों के भाग शामिल हैं।

इन संरचनाओं के अतिरिक्त, उत्खनन में पायी गई अनेक मूर्तियां हैं जो पत्थर, तांबे और गचकारी की हैं। इनमें बौद्ध धर्म की मूर्तियां सबसे महत्वपूर्ण हैं जिनमें महात्मा बुद्घ की अलग-अलग मुद्राओं के अतिरिक्त, अवलोकितेश्वर, मंजूश्री, तारा, प्रज्ञापरमिता, मारिची, जंभल आदि और कुछ प्रतिमाएं विष्णु, शिव-पार्वती, महिषासुर-मर्दिनी, गणेश, सूर्य आदि ब्राह्मण धर्म के देवताओं की हैं। उत्खनन की अन्य उल्लेखनीय खोजों में भित्ति-चित्र, ताम्रपत्र, अभिलेख, मुद्रांक, फलक, सिक्के, मृणमूर्तियाँ, मृद्भांड आदि शामिल हैं। पुरावशेषों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अनुरक्षित स्थानीय संग्रहालय में आगंतुकों के लिए प्रदर्शित किया गया है।

स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला है।
प्रवेश शुल्क:- भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के आगंतुकों के लिए 15/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य:- 200 रूपए प्रति व्यक्ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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