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दौलताबाद किला

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दौलताबाद (19° 57’ उत्‍तर; 75°° 15’ पूर्व) औरंगाबाद जिला मुख्‍यालय के उत्‍तर-पश्चिम में 15 कि॰मी. की दूरी पर स्थित है और एलोरा गुफाओं के रास्ते के बीच में है। दौलताबाद या लक्ष्मी का निवास’ नाम मुहम्‍मद बिन तुगलक द्वारा तब दिया गया था जब सन् 1327 में उसने अपनी राजधानी यहां बसाई थी। प्राचीन नाम देवगिरि या देओगिरि का अर्थ देवगिरि के यादवों के काल में देवताओं की पहाड़ी’ था। आरम्‍भ में यादव आधुनिक धूलिया और नासिक जिलों के क्षेत्र पर कल्‍याणी के चालुक्‍यों के अधीन शासन कर रहे थे और उनकी राजधानी चंद्रादित्‍यपुर (आधुनिक चंदौर, नासिक जिला) थी। एक शक्तिशाली यादव शासक] भिल्‍लम-5 ने होयसाल वंश, परमारों और चालुक्‍यों के विरूद्ध विजयी अभियानों का नेतृत्‍व किया और देवगिरि नगर की स्‍थापना की और अपनी राजधानी यहां बनाई। उसके बाद से उत्‍तरवर्ती यादव शासकों ने अपनी राजधानी यहीं बनाए रखी। कृष्‍णा के पुत्र रामचंद्र देव के शासन काल के दौरान अलाउद्दीन खिलजी ने सन् 1296 में देवगिरि पर हमला किया और उस पर कब्‍जा कर लिया। तथापि रामचंद्रदेव को एक मातहत के रूप में यहां से शासन करने की अनुमति थी। बाद में मलिक काफूर ने क्रमश: सन् 1306-07 और 1312 में रामचंद्र देव और उसके पुत्र शंकर देव के विरूद्ध किए गए दो हमलों का नेतृत्‍व किया। सन् 1312 वाले हमले में शंकर देव मारा गया। मलिक काफूर द्वारा हरपालदेव को सिंहासन पर बिठाया गया जिसने बाद में स्‍वतंत्रता हासिल कर ली। इसके परिणामस्‍वरूप देवगिरि के खिलाफ कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी ने एक और हमला किया और सफल हुआ और यह किला दिल्‍ली सल्‍तनत के अधीन हो गया। दिल्‍ली में मुहम्‍मद बिन तुगलक खिलजी वंश का उत्‍तराधिकारी बना और उसने देवगिरि का पुन: नामकरण दौलताबाद कर दिया और इसके अजेय किले को देखते हुए उसने अपनी राजधानी सन् 1328 में दिल्‍ली से यहां स्‍थानांतरित कर ली। इसके बहुत गंभीर परिणाम हुए और उसे पुन: अपनी राजधानी स्‍थानां‍तरित करके वापस दिल्‍ली ले जानी पड़ी। यह क्षेत्र और यहां का किला सन् 1347 में हसन गंगू के अधीन बहमनी शासकों के हाथों में और फिर सन् 1499 में अहमदनगर की निजामशाहियों के हाथ में चला गया। सन् 1607 में दौलताबाद निजाम शाह राजवंश की राजधानी बन गया। बार-बार होने वाले हमलों तथा इस अवधि के दौरान स्‍थानीय शासक परिवारों के बीच आंतरिक झगड़ों के कारण दक्‍कन ने उथल-पुथल भरा लंबा समय देखा। अकबर और शाहजहां के शासनकाल के दौरान मुगलों ने यहां कई हमले किए और शाहजहां के शासनकाल के दौरान ही चार माह की लंबी घेरेबंदी के बाद यह क्षेत्र सन् 1633 में पूर्णतया मुगलों के कब्‍जे में आ गया। अत: मुगलों ने सत्‍ता प्राप्‍त कर ली और औरंगजेब को दक्‍कन का वायसराय बनाया गया जिसने दौलताबाद से बीजापुर और गोलकोंडा पर अपने हमलों का नेतृत्‍व किया। मराठों की बढ़ती शक्ति ने मुगलों के लिए परेशानी खड़ी कर दी और कुछ समय के बाद यह क्षेत्र मराठों के नियंत्रण में आ गया। अत: दौलताबाद किले पर कई शासकों का शासन रहा, इस पर बार-बार कब्‍जे होते रहे, कभी यह मुगलों के आधिपत्‍य में रहा, कभी मराठों के और कभी पेशवाओं के और अंत में सन् 1724 में यह हैदराबाद के निजामों के नियंत्रण में आ गया और स्‍वतंत्रता प्राप्ति तक उन्‍हीं के नियंत्रण में रहा।

मध्‍यकाल में दौलताबाद का किला सर्वाधिक शक्तिशाली किलों में से एक था। यह किला 200 मीटर ऊंची शंक्‍वाकार पहाड़ी पर बना था और पहाड़ी के चारों ओर इसके नीचे की ओर खाइयां और ढलानें इसकी रक्षा करती थीं। इसके अलावा इसकी रक्षा प्रणाली सर्वाधिक जटिल और पेचीदा थी। किलेबंदी में बुर्जों सहित तीन घेराबंदी दीवारें थीं।

बाह्य दीवार के बीच से प्रवेश किले के बाहर बने दो मजबूत अधूरे बुर्जों से होकर किया जाता है जिसमें एक के बाद एक अनेक द्वार और प्रांगण हैं। इसमें बाह्य भागों पर बहुत मोटी और ऊंची कुंडलित दीवारें हैं और यह बड़े बुर्जों द्वारा रक्षित हैं जो प्रांगण रहित भी हैं और प्रांगणों के भीतर भी हैं। बाद के किसी काल का गढ़गज जिसका प्रवेश मार्ग खंडित हो चुका है, किले के बाहर बने दो अधूरे बुर्जों के समक्ष खड़ा है। प्रवेश मार्ग के दायीं ओर एक बहुत बड़ा बुर्ज है। द्वार के ऊपर प्रवेशमार्ग के मुख पर तोपखाने के निमित्त तीन बड़े विवर बनाए गए हैं। गढ़गज से प्रथम प्रांगण तक का प्रवेश मार्ग एक बड़े मेहराबदार मार्ग से होकर जाता है जिसमें बीच में एक मोड़ है और प्रवेश मार्ग पर दो पल्‍लों वाला दरवाजा है। गार्ड के लिए दायीं ओर एक बड़ा आला है और बायीं ओर द्वार के ऊपर प्राकार दीवार के लिए सीढ़ी है। हाथी के हमले से बचने के लिए जटित और कीलदार बाह्य द्वार अभी भी विद्यमान है। यह एक दुर्जेय अवरोधक है जिसे पृष्‍ठ भाग में थोड़े-थोड़े अंतराल पर भारी काष्‍ठ पट्टियां लगाकर मजबूत बनाया गया है और जब यह दरवाजा बंद हो जाता है तो काष्ठ की एक वर्गाकार छड़ द्वारा यह सुरक्षित रहता है जो एक लंबी सॉकेट से एक पाखे में निकलती है और दरवाजे के पीछे चली जाती है और दूसरे पाखे के एक सॉकेट में फंस जाती है। लोहे की कीलें द्वार के मुख पर क्षैतिजीय पंक्तियों में लगाई गईं हैं।

अगले द्वार मार्ग को मजबूत बुर्जों और एक पंक्तिबद्ध मुंडेर (प्राचीर) द्वारा रक्षित किया गया है। यहां दो पल्‍लों वाला केवल एक ही दरवाजा है लेकिन यह भी भारी संरचना वाला है और लोहे की कीलों से शस्त्र-सज्जित है। प्रवेश द्वार के भीतर ही दो गार्ड कक्ष हैं और दोनों में ही महराबी आले हैं। दूसरे प्रवेश द्वार की ओर अभिमुख अगले प्रांगण में एक विशाल शंक्‍वाकार बुर्ज है जिसका ऊपरी भाग लुप्‍त हो चुका है और इस बुर्ज से, इसकी ऊंचाई के लगभग बीचोंबीच नक्‍काशीयुक्‍त टोडों पर टिका एक आच्छादित छज्‍जा बाहर की ओर निकला दिखाई देता है। किले के बाहर दो अधूरे बुर्जों में स्थित अनुवर्ती द्वार तक पहुँचने के लिए किसी भी व्‍यक्ति को सभी ओर से सटकर निकलने के लिए बनाए गए प्रांगण के बीच में से तिरछे होकर गुजरना होगा। यह प्रवेश द्वार पहले वाले दरवाजों से कहीं अधिक संकीर्ण है जो केवल एकल दो पल्‍लों वाले दरवाजे से ही बंद होता है।

दूसरे आवरण से प्रवेश अपेक्षाकृत सरल है। यहां भी प्रवेश द्वार संकीर्ण है और प्रवेश द्वार की रक्षा, मार्ग के दोनों ओर बने गार्ड कक्षों द्वारा अंदर से ही होती है। यह दुर्ग तुगलक के महल और बाद के काल के अनेक महलों के खंडहरों वाले क्षेत्र से घिरा हुआ है। बाह्य भाग में भी असंख्‍य ध्वस्त भवन हैं जिनमें महल, मंदिर और मस्जिदें शामिल हैं। इसके अलावा, यहां एक सुंदर और उत्कृष्ट मीनार भी है जो 30 मीटर ऊंची है और जिसका घेरा 21 मीटर है। इस मीनार को चांद मीनार के नाम से जाना जाता है और इसका निर्माण सुलतान अला-उदृदीन बहमनी (सुलतान अहमद शाह ।।) ने सन् 1447 में करवाया था।

तीसरी दीवार पहाड़ी पर बहुत ऊपर तक जाती है और इसकी चढ़ाई धीरे-धीरे खड़ी होती जाती है। यहां पर प्रवेश जटिल है और इसको पार करना कठिन है। इसकी रक्षा के लिए दोनों ओर बुर्ज हैं। प्रथम द्वार तक सीढ़ियां जाती है। यदि इस दरवाजे को धकेल भी दिया जाता है तो आक्रमणकारी को सीधे अपने सामने एक आले में गार्डो का सामना करना पड़ता है और यदि वह आगे बढ़ जाता है तो दायीं ओर के एक द्वार पर उसे आगे बढ़ने से रोका जा सकता है जो उपर जाने वाली सीढ़ियों से दीवार में से एक रास्‍ते में जाकर खुलता है। यहां भी पीछे की ओर एक विशाल आले में तैनात गार्ड उस पर हमला कर देंगे। यह आला मार्ग के दायीं ओर है और तीसरा आला सीधे उसके सम्‍मुख होगा। एक तीसरा दरवाजा जो बायीं ओर सीढियों पर खुलता है और यदि पीछे से हमला होता है तो आक्रमणकारी को दीवार के भीतर प्रवेश करने से पूर्व उसे पार करना होगा।

इस स्‍तर से ऊपर जाते हुए और दग्‍धालंकृत खर्परों से सुसज्जित एक महल, चीनी महल के खंडहरों से गुजरते हुए हम दुर्ग के निचले सिरे पर एक चबूतरे पर पहुंच जाते हैं। चीनी महल की बगल में एक बहुत बड़ी तोप रखी है जिसे औरंगजेब के शासन काल के दौरान निर्मित किया गया था। इसे ‘मेंढा तोप’ के नाम से भी जाना जाता है। दुर्ग के प्रवेश द्वार पर एक चौड़ी और गहरी पानी से भरी खाई से सुरक्षा कवच बनाया गया है जिससे इस पर बांध बन गए हैं और पुल के लिए गैर-परंपरागत डिजाइन का एक जलनिमज्जित पक्‍का नदी पथ है। यह प्रतिकगार से सीढियों द्वारा एकदम नीचे जाता है और दूसरी ओर गैलरी के स्‍तर पर उपर पहुंचता है। यह गैलरी एक उंचे बुर्ज के तीनों ओर गोलाकार घूमती है और यदि कोई हमलावर इसमें से हो कर गुजरता है तो बुर्ज के परकोटे और खाई के प्रतिकगार पर स्थित ऊंची दीवार और मजबूत टावर से उस पर हमला होगा। यह दीवार और टावर इस प्रकार से बने हैं कि उस दिशा की ओर देखा जा सके। गैलरी के आखिर में कुछ सीढियां नीचे एक छोटे खुले प्रांगण में जाती हैं जिसकी एक ओर सुरंग का प्रवेश मार्ग है।
ऊपर की ओर जाती हुई लंबी सुरंग खड़ी सीढियों द्वारा खड़ी और घुमाव खाती हुई उपर बढ़ती रहती है। इसमें थोड़े-थोड़े अंतराल पर जो विवर आते हैं वे उन गार्डो (प्रहरियों) के कक्ष हैं जिनके हाथ में सुरंग के इस मार्ग की कमान थी। सुरंग के मुखपर लोहे का एक शटर है जो छोटे पहियों पर क्षैतिजीय रूप में एक चोर दरवाजे की भांति विवर को खोलते-बंद करते हुए चलता है। इस सुरंग का एक सर्वाधिक प्रभावी रक्षा उपाय यह था कि इसमें धुएं के एक अवरोधक की व्‍यवस्‍था की गई थी। लगभग आधा रास्‍ता पार करके एक स्थान पर, जहां सुरंग चट्टान के ऊर्ध्‍वाधर मुख के पास से होकर गुजरती है, एक सुराख बनाया गया था ताकि लोहे की एक अंगीठी में आग के लिए हवा का प्रवाह बन सके। यह अंगीठी सुरंग में खुलने वाले एक छोटे कक्ष के विवर में स्‍थापित की गई थी और जब आग सुलगती थी तो सुराख से बहने वाली हवा धुएं को सुरंग में उड़ा देती थी और सुरंग के मार्ग को दुर्गम बना देती थी।

सुरंग के सिरे पर चोर दरवाजे से निकल कर सीढियों की बहुत चौड़ी और लंबी श्रंखला के आधार पर पहुंचते हैं। ये सीढियां ऊपर बारादरी को जाती हैं जो गर्मियों का निवास स्‍थान होता था और इसे सन् 1636 ई. में शाहजहां के लिए दौलताबाद में उसके आगमन पर बनाया गया था।

इस स्‍तर से एक और सीढ़ी दुर्ग के शीर्ष स्‍तर या चोटी तक जाती है जहां 18 वीं सदी की एक पुरानी तोप अपने मूल सांचे में पड़ी है। दुर्ग में इसके अपने बारहमासी जल स्रोतों से पानी की पर्याप्‍त आपूर्ति हो जाती थी।

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