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विश्व विरासत स्थल-चोल मंदिर-बृहदीश्वर-भूमिका

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भूमिका

बृहदीश्वर मंदिर या पेरियार कोइल (बड़ा मंदिर) जैसाकि स्थानीय तौर पर जाना जाता है, दक्षिण भारत के मंदिरों की वास्तुकला का एक प्रमुख पहचान चिह्न है। यह मंदिर तंजावुर में स्थित है जो तमिलनाडु के इसी नाम के जिले का मुख्यालय भी है। तंजावुर, चेन्नई से लगभग 332 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण पश्चिम में स्थित है।

मंदिर का निर्माण चोल साम्राज्य के शासन काल के दौरान हुआ था जिन्होंने 9वीं से 12वीं सदी तक भारत के दक्षिण भाग में शासन किया। प्रतापी चोलों ने सूर्य या रघुवंश को अपना वंशज माना। हालांकि, ईसा युग के प्रांरम्भिक भाग के दौरान, संगम युगीन चोलों ने भारत के दक्षिण भाग में चेरों और पांड्यों के साथ शासन किया। चोलों का उल्लेख तीसरी सदी ईसा पूर्व के सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी मिलता है। प्रसिद्घ आरंभिक चोल सम्राट, कारिकल को दक्षिण के समस्त राज्यों को एकजुट करने के लिए जाना जाता है और उसे कावेरी नदी पर पत्थर का बांध बनवाने का श्रेय भी दिया जाता है। तीसरी सदी ई. के बाद चोलों ने अपना प्रभुत्व खो दिया और जल्द ही पल्लवों ने दक्षिण भारत पर कब्जा जमा लिया।

8वीं-9वीं सदी ई. के दौरान पल्लवों की सामंतशाहियों के रूप में चोल फिर से प्रकट हुए। यह लगभग 850 ई. के आसपास की बात थी जब तंजावुर के पास विजयल चोल ने एक छोटा राज्य स्थापित किया जिसकी राजधानी उरैयूर थी। उसके पुत्र एवं पोते, आदित्य चोल और परांतक ने दक्षिण भारत के कई भागों पर धीरे-धीरे अपना नियंत्रण स्थापित किया। ये महान मंदिर निर्माता भी थे जिन्होंने कई संरचनात्मक मंदिर बनवाए जो पल्लवों के पत्‍थर से काटकर बनाये गये मंदिरों से हटकर थे। परांतक साम्राज्‍यवादी चोलों का प्रमुख शासक था जिसने पांड्यों के दक्षिण राज्य एवं श्रीलंका पर भी विजय हासिल की और मदुरैयुम इलमुमकोंड़ा की पदवी प्राप्त की।

परांतक के सबसे बड़े बेटे, राजादित्य की मृत्यु राष्ट्रकूट कृष्ण-III के साथ लडाई के दौरान हाथी पर बैठे हुए हुई थी। इसलिए उसके भाई, गंदरादित्य ने सिंहासन को संभाला लेकिन जल्द ही उसकी भी मृत्यु हो गई और इसीलिए उसका भाई, अरिंजय चोलों का राजा बन गया। अरिंजय की मृत्यु भी युद्घ भूमि में हुई जब वह राष्ट्रकूटों से अपने पूर्ववर्ती शासकों से छीने गए राज्य क्षेत्रों को वापिस लेने के लिए लड़ रहा था। अरिंजय का बेटा, सुंदर चोल सिंहासन पर बैठा और उसका सबसे बडा बेटा, आदित्‍य महान् योद्घा और युवराज था जब उसकी हत्‍या हो गयी। आदित्य चोल के भाई, अरूल मोलीवर्मन ने सिंहासन पर बैठने से इन्कार कर दिया था क्योंकि गंदरादित्य का पुत्र, उत्तम चोल जो उसका चाचा था, बडा हो गया था। अरूल मोलीवर्मन ने अंतत: 985 ई. में सिंहासन संभाला और राजराजा चोल की पदवी हासिल की।

राजराजा चोल संभवत: चोल सम्राटों में सबसे महान शासक था। वह महान विजेता, प्रशासक, और कला एवं वास्तुकला का महान संरक्षक था जिससे सिर्फ उसका पुत्र और उत्तराधिकारी, राजेन्द्र चोल ही आगे निकल सका। जैसे ही वह राजगद्दी पर बैठा, राजराजा ने केरलों, पांड्यों एवं सिंहलों, गंगों, चालुक्य सत्याश्रय को एक के बाद एक मात देकर सिंहासन को मजबूत किया। सबसे पहले उसने केरलों, पांड्यों एवं सिंहलों की सेनाओं के परिसंघ को हराया। बाद में वह नौ-अभियान के जरिए सिंहल के राजा महिंद्र-V के पीछे पड़ा और श्रीलंका के उत्तरी भाग पर कब्जा किया और पोलन्नरुवा को चोल प्रदेश की राजधानी बनाया। चालुक्य सत्याश्रय को अपने पुत्र, राजेन्द्र-I के अधीन चोल सेना द्वारा भगा दिया गया और बनवासी और रायचुर दोआब का एक बड़ा भाग अपने कब्जे में कर लिया। उसने अपनी बेटी, कुंदवाई का विवाह चालुक्य शासक, शक्तिवर्मन के भाई, विमलादित्य के साथ करके पूर्वी चालुक्य राजा के साथ वैवाहिक रिश्तेदारी बना ली। उसके पुत्र, राजेन्द्र ने कलिंग में महेन्द्र पहाड़ी पर एक विजय स्तंभ स्थापित किया। राजराजा ने चेर के नियंत्रण वाले मालदीव द्वीप समूह पर भी अपना कब्जा किया एवं मालदीव द्वीप समूह के आस-पास के द्वीपों पर अपना अधिकार जमाया। राजराजा की लीडेन ग्रांट में यह उल्लेख है कि श्री विजय (पलेमबंग) एवं कटाह (केड़ाह) के राजा, शैलेन्द्र ने श्री मार विजय ओतुंगवर्मन को नागपट्टनम में बोद्ध विहार का निर्माण करने की अनुमति प्रदान की थी जिसे चूड़ामणि के नाम से जाना जाता था। राजराजा ने विहार के लिए अनैमंगलम गांव दे दिया था।

राजराजा ने बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण करवाया जो संभवतया दक्षिण भारत के मंदिरों की विमान वास्तुकला का चरम बिंदु है।

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