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बृहदीश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए स्थायी निधि

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बृहदीश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए स्थायी निधि

मंदिर की दीवारों पर असंख्य अभिलेखों से समकालीन धर्म, कला, प्रशासन आदि की स्थिति का पता चलता है। एक अभिलेख में यह भी उल्लेख है कि सम्राट राजराजा ने अपने शासन (1010 ई.) के 25वें वर्ष के 275वें दिन को इस मंदिर में एक सोने का कलश लगवाया था। यह मंदिर शिव और राजराजा को समर्पित है और इसका नाम अपने नाम पर राजराजेश्वरम-उदैयार रखा।

राजराजा ने मंदिर के रख-रखाव के लिए कई बार दान दिया। उनके परिवार के सदस्यों और उनकी सरकार के अन्य उच्च अधिकारियों ने भी इस मंदिर में विभिन्न धार्मिक कार्यों के लिए दान दिया। अभिलेख में तांबे और सोने की विभिन्न मूर्तियां और इन मूर्तियों को सजाने के लिए गहने आदि का भी उल्लेख है। चोल काल की सर्वाधिक शानदार मूर्तियां अब लुप्त हो चुकी हैं लेकिन उनमें से कुछ नटराज, त्रिपुरांतक, देवी एवं गणेश के रूप में अभी भी देखी जा सकती हैं। राजराजा और उसके निकट के सगे-संबंधियों द्वारा दिए गए दान, यहां तक कि लघुतम भारों और मापों के धार्मिक दान, उन्हें प्राप्त करने की विधि, भुगतान ब्यौरे, ब्याज दर, विशेष वस्तुओं की पूजा करने, निरंतर दीया जलाने के प्रावधान आदि का अभिलेखों में उल्लेख किया गया है। धार्मिक दान की योजना कुशलतापूर्वक तैयार गई थी जिससे कि रसोइयों, मालियों, पुष्प एकत्र करने वालों, माला बनाने वालों, संगीतज्ञों, ड्रम बजाने वालों, नर्तकों, नृत्य गुरुओं, लकड़ी पर नक्‍काशी करने वालों, मूर्तिशिल्पकारों, चित्रकारों, संस्कृत और तमिल में भजन गाने के लिए गायकों के समूह, लेखाकारों, पहरेदारों, मंदिर के लिए अन्य कई कर्मचारियों और नौकरों की व्यवस्था भी की जा सके और इसका उल्लेख अभिलेखों में मिलता है। राजराजा ने मंदिर से जुड़ी लगभग चार सौ नृत्यांगनाओं के रहने के लिए दो लंबी गलियां (बस्तियाँ) भी बनवाई थी। ये समकालीन इतिहास, रीति रिवाज, समाज के संघठन आदि को जानने के उत्तम स्रोत हैं। ये मंदिर उन दिनों के दौरान महान राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र थे। साथ ही ये कला, संस्कृति, धर्म, नृत्य, संगीत के भी केंद्र थे और यहां तक कि प्रशासनिक मामलों का निर्णय भी मंदिर के परिसर में लिया जाता था।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि राजराजा ने सम्पूर्ण दक्षिण भारत को अपने आधिपत्य में लेने के बाद, इस महान मंदिर के रूप में अपनी उत्कृष्टता को और अधिक शाश्वत प्रतिमा के रूप में स्थापित करने का निश्चय किया होगा।

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