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टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-राजस्‍थान चित्‍तौड़गढ़ किला, चित्‍तौड़गढ़

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प्राचीन चित्रकूट दुर्ग या चित्‍तौड़गढ़ किला (अक्षांश 24° 59 उ; रेखांश 75°°33 पू.) राजपूत शौर्य के इतिहास में गौरवपूर्ण स्‍थान रखता है तथा 7वीं से 16वीं शताब्‍दी ई. तक यह सत्‍ता का महत्‍वपूर्ण केन्‍द्र रहा। लगभग 700 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह किला 152 मीटर ऊंची पहाड़ी पर खड़ा है तथा ऐसा कहा जाता है कि 7वीं शताब्‍दी ई. में मोरी राजवंश के चित्रांगद द्वारा इसका निर्माण करवाया गया था। यह कई राजवंशों के शासन का साक्षी रहा है जैसे:-

  1. मोरी या मौर्य (7वीं -8वीं शताब्‍दी ई.)
  2. प्रतिहार (9वीं -10वीं शताब्‍दी ई.)
  3. परमार (10वीं -11वीं शताब्‍दी ई.)
  4. सोलंकी (12वीं शताब्‍दी ई.) और अंत में
  5. गुहीलोत या सिसोदिया

किले के लम्‍बे इतिहास के दौरान इस पर तीन बार आक्रमण किए गए। पहला- 1303 में अलाऊद्दीन खिलजी द्वारा, दूसरा- 1535 में गुजरात के बहादुर शाह द्वारा तथा तीसरा- 1567-68 में मुगल बादशाह अकबर द्वारा और प्रत्‍येक बार यहां जौहर किया गया। इसकी प्रसिद्ध स्‍मारकीय विरासत की विशेषता इसके विशिष्‍ट मजबूत किले, प्रवेशद्वार, बुर्ज, महल, मंदिर, दुर्ग तथा जलाशय स्वयं बताते हैं जो राजपूत वास्‍तुकला के उत्‍कृष्‍ट नमूने हैं।

किले के भीतर महत्‍वपूर्ण स्‍मारकों का संक्षिप्‍त विवरण इस प्रकार है:

प्रवेश द्वार

किले के सात प्रवेश द्वार हैं। प्रथम प्रवेश द्वार पैदल पोल के नाम से जाना जाता है जिसके बाद भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोली पोल, लक्ष्‍मण पोल तथा अंत में राम पोल है जो 1459 में बनवाया गया था। किले की पूर्वी दिशा में स्‍थित प्रवेशद्वार को सूरज पोल कहा जाता है।
कुम्भा महल

महल का नाम महाराणा कुम्‍भा (1433&68) के नाम पर पड़ा है जिन्‍होंने पुराने महल में बड़े स्‍तर पर मरम्‍मत करवाई थी। महल में बड़ी पोल तथा त्रिपोलिया नामक द्वारों से प्रवेश किया जाता है जो आगे खुले आंगन में सूरज गोखरा, जनाना महल, कंवरपाद के महल की तरफ जाता है। इस महल परिसर के दक्षिणी भाग में पन्‍नाधाई तथा मीराबाई के महल स्‍थित हैं।

पद्मिनी महल

राणा रत्‍न सिंह की खुबसूरत रानी, रानी पद्मावती के नाम पर इसका नाम रखा गया है। यह महल पद्मिनी तालाब की उत्‍तरी परिधि पर स्‍थित है। ऐसा कहा जाता है कि अलाऊद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी के ख्‍याति प्राप्‍त सौन्‍दर्य को एक शीशे के माध्‍यम से यहीं से देखा था तथा बाद में किले पर आक्रमण किया था। जल महल के रूप में विख्‍यात एक तीन मंजिला मंडप इस तालाब के बीच में खड़ा है।

रत्‍न सिंह महल

रत्‍नेश्‍वर तालाब के साथ स्‍थित यह महल राणा रत्‍न सिंह II (1528-31) का है। योजना में यह आयताकार है तथा इसमें एक आंगन है जो कक्षों तथा एक मंडप जिसकी बॉलकोनी दूसरी मंजिल के पूर्वी भाग पर है, से घिरा है।

फतेह प्रकाश महल

यह खूबसूरत दो मंजिला महल महाराजा फतेह सिंह (1884-30 ई.) द्वारा बनवाया गया था। यह एक ऐसा महल है जिसके चारों कोनों पर एक-एक बुर्ज है जो गुम्‍बददार छतरियों से सुसज्‍जित हैं। यह महल आधुनिक भारतीय वास्‍तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है तथा वर्तमान में इसमें एक संग्रहालय स्थित है।

तुलनात्‍मक रूप से कम महत्‍व की अन्‍य हवेलियों में अल्‍हा कब्र, फत्‍ता तथा जयमल, खातन का महल तथा पुरोहित जी की हवेली शामिल हैं।

कालिका माता मंदिर

राजा मानभंग द्वारा 8वीं शताब्‍दी में निर्मित यह मंदिर मूल रूप से सूर्य को समर्पित है जैसाकि इस मंदिर के द्वार पाखों के केन्‍द्र में उकेरी गयी सूर्य की मूर्ति से स्‍पष्‍ट है। समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार किया गया है। इसमें गर्भगृह, अन्‍तराल, एक बंद मंडप तथा एक द्वारमण्डप है। इस समय कलिका माता या काली देवी की पूजा मंदिर की प्रमुख देवी के रूप में होती है।

समाधीश्‍वर मंदिर

भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भोज परमार द्वारा 11वीं शताब्‍दी के प्रारंभ में बनवाया गया था। बाद में मोकल ने 1428 ई. में इसका जीर्णोद्धार किया। मंदिर में एक गर्भगृह, एक अन्‍तराल तथा एक मुख्‍य मंडप है जिसके तीनों मुखों अर्थात् उत्‍तरी, पश्‍चिमी तथा दक्षिणी ओर मुख मंडप (प्रवेश दालान) हैं। देव मंदिर में भगवान शिव की त्रिमुखी विशाल मूर्ति स्‍थापित है।

कुंभास्‍वामी मंदिर

मूल रूप से वराह (विष्‍णु का शूकर अवतार) को समर्पित इस मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्‍दी में करवाया गया था तथा महाराणा कुम्‍भा (1433-68 ई.) द्वारा इसका बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार किया गया। यह एक ऊँचे अधिष्‍ठान पर निर्मित है तथा इसमें एक गर्भगृह, एक अन्‍तराल, एक मंडप, एक अर्द्ध मंडप तथा एक खुला प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर के पृष्‍ठ भाग के मुख्‍य आले में वराह की मूर्ति दर्शाई गई है। मंदिर के सामने एक छतरी के नीचे गरुड़ की मूर्ति है। उत्‍तर में एक लघु मंदिर है जिसे मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है।

सात बीस देवरी

स्‍थानीय रूप से सात बीस देवरी के नाम से प्रसिद्ध, 27 जैन मंदिरों का यह समूह एक अहाते के बीच स्‍थित है जिसे 1448 ई. में बनवाया गया था। प्रमुख मंदिर में गर्भगृह, अन्‍तराल, मंडप, सभा मंडप तथा मुखमंडप शामिल हैं। परिसर के पूर्व में दो पूर्वोन्‍मुख मंदिर है।

कीर्ति स्‍तंभ

यह शानदार मीनार जिसे स्‍थानीय रूप से विजय स्‍तंभ के रूप में जाना जाता है, महाराणा कुम्‍भा द्वारा 1448 ई. में बनवाया गई थी। भगवान विष्‍णु को समर्पित यह मीनार 37.19 मीटर ऊंची है तथा नौ मंजिलों में विभक्‍त है। चित्‍तौड़ के शासकों के जीवन तथा उपलब्‍धियों का विस्‍तृत क्रमवार लेखा-जोखा सबसे ऊपर की मंजिल में उत्‍कीर्ण है जिसे राणा कुम्‍भा की सभा के विद्वान, अत्री ने लिखना शुरू किया था तथा बाद में उनके पुत्र, महेश ने इसे पूरा किया। कोई भी व्‍यक्‍ति आन्‍तरिक रूप से व्‍यवस्‍थित सीढ़ियों द्वारा सबसे ऊपर की मंजिल तक पहुंच सकता है। इस मीनार के वास्‍तुविद्, सूत्रधार जैता तथा उसके तीन पुत्रों- नापा, पुजा तथा पोमा के नाम पांचवीं मंजिल में उत्‍कीर्ण हैं।

जैन कीर्ति स्‍तंभ

24.50 मीटर ऊंचाई वाला यह छह मंजिला टॉवर प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है। इसका निर्माण श्रेष्‍ठी जीजा द्वारा 1300 ई. में करवाया गया था। टॉवर उठे हुए चबूतरे पर निर्मित है तथा इसमें आंतरिक रूप से व्‍यवस्‍थित सीढ़ियां हैं। निचली मंजिल में सभी चारों मूलभूत दिशाओं में आदिनाथ की खड़ी प्रतिमाएं बनी हैं जबकि ऊपर की मंजिलों में जैन देवताओं की सैकड़ों छोटी मूर्तियां हैं।

गौमुख कुंड

समाधीश्‍वर मंदिर के दक्षिण में स्‍थित तथा पश्‍चिमी परकोटे से सटा गौमुख कुंड एक विशाल, गहरा, शैलकृत जलाशय है जिसका आकार आयताकार है। एक छोटी प्राकृतिक गुफा से बिल्‍कुल स्‍वच्‍छ जल की भूमिगत धारा बारह महीने गोमुख (गाय के मुख के आकार) से बहती है इसलिए इसका नाम गौमुख है।

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