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चारमीनार

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हैदराबाद की पहचान- चारमीनार कुतुब शाही राजवंश के पांचवें शासक और हिजरी 1000 (ईसवी सन् 1591-92) में इस शहर के संस्थापक मोहम्मद कुली कुतुबशाह द्वारा बनवाई गई एक भव्‍य मीनार है। यह एक वर्गाकार मीनार है जो प्रत्येक तरफ से 31.95 मीटर है और जिसके प्रत्येक ओर 11 मीटर चौड़े मेहराब बने हैं। यहां चार मीनारें हैं। प्रत्येक मीनार तीन मंजिली है जिनकी ऊंचाई 56 मीटर तक है। मीनार के भीतर 149 घुमावदार सीढि़यां हैं जो 12 अवतरणों (लैंडिग) के साथ ऊपर तक जा रही हैं। छतों पर दोहरे पर्दे वाली मेहराब और मीनारों पर बने अलंकृत मेहराब ने इसके सौंदर्य को और बढ़ा दिया है। इस चारमीनार की मुख्य विशेषता यह है कि इसकी दूसरी मंजिल के पश्चिमी भाग में एक मस्जिद बनी है जो संभवत: इस काल की सुन्‍दरतम मस्जिदों में से एक है। इसमें पैंतालीस मुशल्‍ला (नमाज अदा करने का स्थान) हैं जिनके सामने खुला आंगन है।
 
यह इमारत गचकारी अलंकरण की बहुलता और जंगलों और झरोखों (बालकनी) के विन्यास के लिए भी जानी जाती है। फूलों के डिजाइन भिन्न-भिन्न हैं और बड़ी बारीकी से बनाए गए हैं। यह स्थानीय शिल्पकारों द्वारा बनाया गया मुगल और हिन्दू वास्तुशिल्प का संयोजन है।
 
चारमीनार का निर्माण किस प्रयोजन से किया गया, इसके संबंध में अनेक धारणाएं हैं। लेकिन व्यापक रूप से यह स्वीकार किया गया है कि चारमीनार, प्लेग उन्मूलन की स्मृति में नगर के मध्य भाग में बनाई गई थी। अठाहरवीं शताब्दी के मध्य में फ्रांस के कमाण्डर बुस्सी ने चारमीनार को अपना मुख्यालय बना लिया था।
 
बाद में वर्ष 1889 में इसमें चारों दिशाओं में चार घडि़यां लगायी गईं। चारमीनार के तल के मध्य भाग में मस्जिद में नमाज पढ़ने से पहले परम्परागत प्रक्षालन के लिए एक वजू (पानी का हौज)हैजिसमेंएकछोटाफव्‍वारालगाहै।
 

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