"All Centrally Protected Monuments & Museums of ASI will remain closed till 31.05.2021 or until further orders due to COVID situation."

विश्व विरासत स्थल-एलोरा गुफाएं-बौद्ध गुफा समूह

hdr_elloracaves

विश्व विरासत स्थल-एलोरा गुफाएं-बौद्ध गुफा समूह गुफा सं. 02, 05, 10, 12,

एलोरा में सबसे पहले बौद्धों ने गुफाओं की खुदाई आरंभ की। यहां उत्‍खनन की अवधि लगभग 450-700 ईसवी मानी जा सकती है। इस अवधि के दौरान 12 गुफाओं की खुदाई बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा की गई थी। इन गुफाओं के काल के आधार पर इन 12 गुफाओं को दो समूहों में बांटा जा सकता है। बारह गुफाओं में से गुफा सं.1 से 5 सबसे पहले काल की हैं और इन्‍हें गुफा सं.6 से 12 जो बाद के काल की हैं, से अलग समूह में रखा गया है। इन दोनों समूहों में चैत्‍यगृह और बौद्ध विहार शामिल हैं।

गुफा सं.2- यह भगवान बुद्ध को समर्पित एक मंदिर है जिस तक सीढि़यों से पहुंचा जाता है और इसमें पार्श्व वीथियों वाला एक स्‍तंभयुक्‍त मंडप है जिसके पिछले सिरे पर एक मंदिर है। इन पार्श्‍व वीथियों में निम्नस्तरीय आलों में बुद्ध की मूर्तियां हैं जिनमें से अनेक मूर्तियां अपूर्ण हैं। स्‍तंभ कुशन ब्रैकटों से अलंकृत हैं। विशेष रूप से द्वारपालों की मूर्तियां विशालाकार हैं और मंदिर में बुद्ध के अलावा अनेक गौण देवी-देवताओं की मूर्तियां भी प्रदर्शित हैं।

गुफा सं. 5- यह एक विहार है जिसे महारवाद कहा जाता है और यह 117 फुट गहरा और 59 फुट चौड़ा है। इस बौद्ध विहार की यह उल्‍लेखनीय विशेषता है कि इसके केंद्र में स्थित दो लंबी और कम ऊंची पत्‍थर की बेंचें हैं जो इस विहार की पूरी लंबाई तक फैली हैं जिनके दोनों ओर 24 स्‍तंभों की पंक्ति है अर्थात दोनों ओर 12-12 स्तंभ हैं। इस बौद्ध विहार में पिछले सिरे पर बुद्ध का एक मंदिर है और भिक्षुओं के लिए 20 कक्ष हैं। शायद यह गुफा उपदेश देने और बौद्ध सिद्धांतों और शिक्षा को सीखने का स्‍थान रही होगी और पत्थर की बेंचें भिक्षु शिष्‍यों के लिए बैठने की सीटें रही होंगी।

गुफा सं.10- यह गुफा विश्‍वकर्मा (देवताओं के वास्‍तुकर) गुफा के नाम से प्रसिद्ध है और इसे सूतर-का-झोपड़ा (बढ़ई की झोंपड़ी) के नाम से भी जाना जाता है। स्‍थानीय बढ़ई गुफा में निरंतर आते रहते थे और शिल्‍प के संरक्षक, विश्‍वकर्मा के रूप में भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं। इस गुफा में एक द्वार के माध्यम से प्रवेश होता है जो प्राकृतिक शिला को काट कर बनाया गया है। यह द्वार ऊपर से खुले अहाते में जाता है जिसके दाईं और बाईं ओर प्रकोष्‍ठ दो मंजिलों में बनाए गए हैं। अहाते से होते हुए हम भगवान बुद्ध के प्रार्थनालय में पहुंचते हैं जो कि एक विशिष्ट चैत्‍यगृह है। यह प्रार्थनालय 81 फुट लंबा, 43 फुट चौड़ा और 34 फुट ऊँचा है। यह हॉल मध्यभाग में 14 फुट ऊंचे 28 अष्‍टकोणीय स्तंभों द्वारा पार्श्‍व गलियारों में विभक्‍त है।

आम आगंतुक धर्मचक्र प्रवर्तनमुद्रा में बैठे भगवान बुद्ध की प्रतिमा के दर्शनमात्र से ही गदगद हो जाता है। यह प्रतिमा लगभग 11 फुट ऊंची है और प्रवेश द्वार तथा बालकनी में चैत्‍य गवाक्ष से प्रवेश करते समय प्राकृतिक रोशनी में भी यह दिखाई पड़ती है। यहां बुद्ध की मूर्ति एक विशाल स्‍तूप के अग्रभाग में रखी है जो लगभग 27 फुट ऊंची है।

छत एक विशाल महराब है जिसमें लकड़ी की डाटों की अनुकृति पत्‍थर के काम में बहुत सफाई से प्रस्‍तुत की गई है। स्‍तंभों के बीच का समतल भाग और पत्‍थर की डाटों के तल को गलियारा कहा जाता है जो बैठी मुद्रा में बुद्ध की मूर्तियों की श्रंखला से अलंकृत है और जिनके दोनों ओर परिचरों की मूर्तियां हैं।

चैत्‍यगृह के सामने की विशाल चैत्‍य चाप ने एक त्रिपर्णी अलंकरण का रूप प्राप्‍त कर लिया है जो कि पहले के चैत्‍यों की विशाल उठी हुई घोडे की नाल सी दिखने वाली चाप से भिन्‍न है। इस चाप के तीन भाग हैं। केंद्रीय भाग इसके केंद्र में स्थित एक अटारी गवाक्ष से अलंकृत है जो गुफा के भीतरी भाग को भी प्रकाशमान करता है। नीचे अन्‍य दो भागों में निम्नस्तरीय आले हैं जिनमें उत्‍तर में अवलोकितेश्‍वर की और दक्षिण में मंजुश्री की मूर्तियां हैं। ये आले लघु मंदिर वेदिकाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और ये समकालीन एक शिखर की अनुकृति से अत्‍यधिक सुंदरता से सज्जित हैं। चैत्‍य चाप और छज्‍जे की सजावट सूक्ष्‍मता के साथ की गई है और इन पर काष्‍ठीय वास्‍तुकला की नकल भी की गई हैं। यहां तक कि शहतीरों और सरदलों के जोड़ों पर जो लकड़ी की कीलें हैं वे भी पत्‍थर की सी दिखती नीचे हैं।

गुफा सं. 12 (तीन तल) -एलोरा में या कहें कि पूरे महाराष्‍ट्र में यह सबसे बड़ा बौद्ध विहार परिसर है। यह परिसर तीन मंजिला है, अत: इसे स्‍थानीय तौर पर तीन तल कहा जाता है। इस विशाल परिसर में एक विशाल प्रवेश मार्ग द्वारा प्रवेश किया जाता है जो प्राकृतिक चट्टान को काटकर बनाया गया है और यह एक विशाल आँगन में जाता है। दाईं ओर की सीढि़‍यां प्रथम मंजिल पर ले जाती हैं‍ जिसके पिछले सिरे के मध्‍य में एक मंदिर है। प्रथम मंजिल की पार्श्‍व भित्तियों पर नौ प्रकोष्‍ठ व्‍यवस्थित हैं। बुद्ध तथा अन्‍य गौण देवी-देवताओं की मूर्तियां इन दीवारों को अलंकृत करती हैं।

एक सीढ़ीदार मार्ग दूसरी मंजिल पर ले जाता है जो कि एक विशाल हॉल है और जो उत्‍तर से दक्षिण की ओर 118 फुट लंबा और 34 फुट चौड़ा है। यह हाल आठ वर्गाकार स्‍तंभों की पंक्तियों द्वारा तीन गलियारों में विभक्‍त है। इस तल पर 13 कक्ष हैं जो हालों के अंत में और पिछली दीवार पर वेधकर बनाए गए हैं। इस मंजिल के पूर्वी ओर के मंदिर में भूमिस्‍पर्श मुद्रा में बु्द्ध की एक विशाल मूर्ति है। बुद्ध की मूर्ति के सामने सुजाता की मूर्ति है जो पायस अर्पित कर रही हैं। यह प्रकरण सिद्धार्थ के बुद्ध बनने से पूर्व अर्थात् उन्‍हें ज्ञान प्राप्‍त होने से पूर्व की घटनाओं का स्‍मरण कराता है। बैठी हुई मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति के दोनों ओर पांच-पांच बोधिसत्‍वों की पंक्तियां है।

सबसे ऊपरी तल पर उत्‍तर की ओर बनी सीढि़यों से पहुंचा जा सकता है। ऊपरी तल या मंजिल लगभग निचली मंजिल के समान क्षेत्रफल वाला एक विशाल हॉल है जिस के पूर्व में एक मंदिर और एक विशाल उपकक्ष है। हॉल की पश्‍चिमी भित्ति में बुद्ध की चौदह मूर्तियां मौजूद हैं। सात उत्‍तर में और सात दक्षिण में हैं। उत्‍तर की सात मूर्तियां भूमि स्‍पर्श मुद्रा में हैं और ये विपश्‍यी, शिखी, विश्‍वबाहु, क्रकुछंद, कनकमुनि, कश्‍यप और शाक्‍यसिंह मुद्राएं हैं। ये सब मानुषी बुद्ध हैं। दक्षिण की ओर की सात मूर्तियां अलौकिक बुद्ध के रूप हैं। उपकक्ष की पार्श्‍व भित्तियां तीन देवियों की मूर्तियों से अलंकृत हैं। दोनों ओर तीन-तीन मूर्तियां हैं। मंदिर की सजावट भगवान बुद्ध की विशालाकार मूर्ति से की गई है जिसके एक ओर पद्मपाणी और दूसरी ओर वज्रपाणी की मूर्तियां हैं।

Facebook Twitter