"All Centrally Protected Monuments & Museums of ASI will remain closed till 31.05.2021 or until further orders due to COVID situation."

बीबी का मकबरा, औरंगाबाद

hdr_maha_bibikamaqbara

टिकट द्वारा प्रवेश वाले स्मारक-महाराष्ट्र

बीबी का मकबरा मुगल सम्राट औरंगज़ेब (1658-1707 ईसवी) की पत्‍नी रबिया-उल-दौरानी उर्फ दिलरास बानो बेगम का एक सुंदर मकबरा है। ऐसा माना जाता है कि इस मकबरे का निर्माण राजकुमार आजम शाह ने अपनी मां की स्‍मृति में सन् 1651 से 1661 के दौरान करवाया। मुख्‍य प्रवेश द्वार पर पाए गए एक अभिलेख में यह उल्‍लेख है कि यह मकबरा अताउल्‍ला नामक एक वास्‍तुकार और हंसपत राय नामक एक इंजीनियर द्वारा अभिकल्पित और निर्मित किया गया। इस मकबरे का प्रेरणा स्रोत आगरे का विश्‍व प्रसिद्ध ताजमहल रहा जिसका निर्माण सन् 1631 और 1648 के बीच हुआ और इसलिए इसे ठीक ही दक्‍कन के ताज के नाम से जाना जाता है।

यह मकबरा एक विशाल अहाते के केंद्र में स्थित है जो अनुमानत: उत्तर-दक्षिण में 458 मीटर और पूर्व-पश्‍चिम में 275 मीटर है। बरादरियां या स्तंभयुक्त मंडप, अहाते की दीवार के उत्‍तर, पूर्व और पश्‍चिमी भाग के केंद्र में अवस्थित हैं। विशिष्ट मुगल चारबाग पैटर्न मकबरे को शोभायमान करता है और इस प्रकार इसकी एकरूपता और इसके उत्‍कृष्‍ट उद्यान विन्‍यास से इसके सौंदर्य और भव्‍यता में चार चांद लग जाते हैं। अहाते की ऊंची दीवार नुकीले चापाकार आलों से मोखेदार बनाई गई है और इसे आकर्षक बनाने के लिए नियमित अंतरालों पर बुर्ज बनाए गए हैं। आलों को छोटी मीनारों से मुकटित भित्ति स्‍तंभों द्वारा विभक्‍त किया गया है।

इस मकबरे में प्रवेश इसकी दक्षिण दिशा में एक लकड़ी के प्रवेश द्वार से किया जाता है जिस पर बाहर की ओर से पीतल की प्‍लेट पर बेल-बूटे के उत्‍कृष्‍ट डिजाइन हैं। प्रवेश द्वार से गुजरने के बाद एक छोटा सा कुण्‍ड और साधारण आवरण दीवार है जो मुख्‍य संरचना की ओर जाती है। आवरण वाले मार्ग के केंद्र में फव्‍वारों की एक श्रंखला है जो इस शांत वातावरण का सौंदर्य और अधिक बढ़ा देती हैं।

यह मकबरा एक ऊंचे-वर्गाकार चबूतरे पर बना है और इसके चारों कोनों में चार मीनारें हैं। इसमें तीन ओर से सीढियों दवारा पहुंचा जा सकता है। मुख्य संरचना (भवन) के पश्चिम में एक मस्जिद पाई गई है जो हैदराबाद के निजाम ने बाद में बनवाई थी जिसके कारण प्रवेश मार्ग बंद हो गया है। इस मकबरे में डेडो स्तर तक संगमरमर लगा हुआ है। डेडो स्‍तर से ऊपर गुम्‍बद के आधार तक यह बेसाल्‍टी ट्रैप से बना है और गुम्‍बद भी संगमरमर से बना है। महीन पलस्‍तर से बेसाल्‍टी ट्रैप को ढका गया है और इसे पॉलिश से चमकाया गया है और सूक्ष्‍म गचकारी अलंकरणों से सजाया गया है। रबिया-उल-दौरानी के मानवीय अवशेष भूतल के नीचे रखे गए हैं जो अत्‍यंत सुंदर डिजाइनों वाले एक अष्‍टकोणीय संगमरमर के आवरण से घिरा हुआ है जिस तक सीढियां उतर कर जाया जा सकता है। मकबरे के भूतल के सदृश इस कक्ष की छत को अष्‍टकोणीय विवर द्वारा वेधा गया है और एक नीची सुरक्षा भित्ति के रूप में संगमरमर का आवरण बनाया गया है। अत: अष्‍टकोणीय विवर से नीचे देखने पर भूतल से भी कब्र को देखा जा सकता है। मकबरे के शिखर पर एक गुम्‍बद है जिसे जाली से वेधा गया है और इसके साथ वाले पैनलों की पुष्‍प डिजाइनों से सजावट की गई है जो उतनी ही बारीकी और सफाई से की गई है जितनी कि आगरा के ताज महल की।

मकबरे के पश्‍चिम में एक छोटी मस्ज्दि स्थित है जो शायद बाद में बनाई गई है। आलों को पांच नोकदार चापों द्वारा आर-पार वेधा गया है और प्रत्‍येक कोने पर एक मीनार देखी जा सकती है।

गुलाम मुस्‍तफा के तवारीखनामा के अनुसार मकबरे के निर्माण पर सन् 1651-1661 ईसवी में 6,68,203-7 रूपए (छह लाख, अड़सठ हजार दो सौ तीन रूपए और सात आने) की लागत आई थी।

Facebook Twitter