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गुफाएं, मंदिर और शिलालेख, भाजा

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गुफाएं, मंदिर और शिलालेख, भाजा

भाजा (18° 44’ उत्तर; 73° 29’ पूर्व) महाराष्‍ट्र में हीनयान संप्रदाय का एक महत्‍वपूर्ण बौद्ध केंद्र है। इस समूह में 22 उत्खनन शामिल हैं और यह पुणे जिले में भाजा ग्राम, मवाल तालुक के निकट एक पहाड़ी पर स्थित है। भाजा का महत्‍व इसी पहाड़ी के दक्षिणी मुख पर स्थित दो और बौद्ध विहार परिसरों की मौजूदगी से और भी बढ़ जाता है। इनमें से बेदसा जो उसी पहाड़ी के दक्षिणी मुख पर अवस्थित है जिसपर भाजा स्थित है और करला जो भाजा के उत्‍तर के ठीक दूसरी ओर है और जो भाजा से लगभग 5 कि॰ मी. दूर है। सभी गुफाएं हीनयान काल की हैं और इनका समय तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्‍दी ईसवी तक का है। तथापि यह गुफा-समूह पांचवी-छठी शताब्‍दी ईसवी तक प्रयोग में था जैसा कि चैत्यगृह में बुद्ध की कुछ चित्रित प्रतिमाओं से प्रमाणित होता है। इन्‍हें आसपास की समतल भूमि से 120 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ी के एक टुकड़े पर खोदा गया है और इन सबका मुख पश्चिम की ओर है। इंद्रयाणी नदी पास ही बहती है और इस घाटी को सींचती है। यह क्षेत्र मध्‍यकाल में भी इस्तेमाल में था। साथ वाली पहाड़ी के शीर्ष के साथ-साथ दो मराठा किलों-लोहागढ़ और वीसापुर की मौजूदगी इसका प्रमाण है।

यहां जो संदाता अभिलेख मिले हैं वे किसी विशेष परिवार या राजवंश के नहीं हैं। तथापि एक जलकुंड की पृष्‍ठभित्ति पर पाया गया दूसरी शताब्‍दी का एक अभिलेख महारथी कोसीकीपुत विहनुदता के दान का उल्लेख करता है जो इन गुफाओं के लिए हो सकता है। लकड़ी के शहतीर पर मेहराब के ही नीचे लिखत दो अन्‍य अभिलेख संक्षिप्‍त हैं और स्‍वरूप में समर्पणात्‍मक हैं और इनका काल ईसा पूर्व दूसरी शताब्‍दी है। लकड़ी के शहतीरों पर इस मूल अभिलेख का बचे रहना यह दर्शाता है कि ये शहतीर गत 2200 वर्षों से बचे हुए हैं।

यहां के उत्खननों में चैत्‍यगृह, विहार और पौड़ियां शामिल हैं। उत्खननों में सर्वाधिक विशिष्‍ट उत्खनन चैत्‍यगृह का है। यह चैत्‍यगृह अपनी तरह का सबसे पुराना चैत्‍यगृह माना जाता है और यह लकड़ी के आदिम रूप की बहुत अधिक मिलती-जुलती प्रतिकृति है। निर्माण योजना में एक विशाल गजपृष्ठीय हॉल है जिसकी लंबाई 17.08 मीटर और चौड़ाई 8.13 मीटर है। यह हाल 27 स्‍तंभों द्वारा मध्‍य भाग और पार्श्‍व गलियारों में विभक्‍त है। ये स्तंभ दो सीधी पंक्तियों में हैं जो पीछले भाग में एक अर्धवृत्त में मिलती हैं। मध्‍य भाग की छत मेहराबदार है और इसमें काष्‍ट के मूल शहतीर स्‍थापित हैं। ये स्तंभ सादे अष्‍टकोणीय हैं और काष्‍ठ की संरचनाओं की अपेक्षानुसार भीतर की ओर शुंडाकार हैं। यह संरचना मौजूदा काष्‍ठ संरचना से मेल खाती है। किसी काष्‍ठ संरचना में स्तंभों से भीतर की ओर ढलान, शीर्ष से बाहर की ओर पड़ने वाले दबाव को सहन करने के लिए अपेक्षित होती है। पीछे की ओर एक स्‍तूप पूजा के लिए है और इसका ब्‍यास 3.45 मीटर है। स्‍तूप पर एक रेलिंग पैटर्न (हर्मिका) द्वारा मुकटित एक बेलनाकार ड्रम पर अर्धगोलाकार गुम्‍बद है और इसमें लकड़ी की छतरी लगाने के लिए शीर्ष पर एक छेद भी बना है।

इस समय हॉल का प्रवेशमार्ग पूर्णतया खुला है। तथापि, चूल छिद्र निशान (प्रमाण) यह दर्शाते हैं कि चैत्‍य मेहराब के नीचे लकड़ी का एक अग्रभाग और चैत्‍य खिड़की का लकड़ी का आवरण भी मौजूद था। चैत्यगृह का अग्रभाग अत्‍यधिक अलंकृत है और यह दूसरी सदी ईसा पूर्व की काष्‍ठ-वास्‍तुकला की सच्‍ची प्रतिकृति का प्रतिनिधित्व करता है। केंद्रीय चाप के दोनों ओर रेलिंग पैटर्नों पर लघु चैत्‍य चापों की श्रृंखलाएं हैं।

गुफा संख्‍या-18 एक बौद्ध विहार है और इसमें एक आयताकार हॉल है जिसमें आगे की ओर स्‍तंभों वाला बरामदा है। हाल में पीछे की ओर तथा दायीं ओर दो-दो प्रकोष्‍ठ हैं जबकि बायीं ओर एक बैंच है। चैत्यगृह के स्तंभों से भिन्न] इन स्तंभों का आधार वर्गाकार है और शीर्ष भाग मध्‍य में अष्‍टकोणीय आकार का है। बरामदे की ओर से दो द्वार हॉल की ओर जाते हैं जिनके दोनों ओर अत्‍यधिक मात्रा में रत्‍नों से जटित द्वारपाल हैं। इस बौद्ध विहार के बरामदे में दो प्रसिद्ध मूर्तिकलात्‍मक नक्‍काशियां हैं जो बहुत महत्‍वपूर्ण हैं। एक में, एक शाही व्‍यक्ति को दिखाया गया है जिसके स्‍वागत में दो महिलाएं लगी हैं और यह चार घोड़ों वाले रथ पर सवार है जो एक दानव को कुचलते हुए आगे बढ़ रहा है। राजसी परिधान वाले व्‍यक्ति की पहचान कुछ लोगों ने सूर्य देवता या सूर्य के रूप में की है। द्वार के बायीं ओर एक ऐसे व्‍यक्ति का चित्र है जो हाथी पर सवार है और उसके पास अंकुश है और साथ में सेवक बैनर और भाले लेकर चल रहे हैं। कुछ लोगों ने इस आकृति या चित्र की पहचान इंद्र के रूप में की है।

अत्‍यधिक सज्जित और काफी बड़ी गुफा संख्‍या-18 के अलावा, भाजा स्थित गुफा समूह में अन्य साधारण प्रकार के बौद्ध विहार हैं, बरामदे वाले हॉल हैं, बौद्ध विहार में एक, दो या तीन ओर प्रकोष्‍ठ हैं। कुछ अपवाद भी देखे जा सकते हैं जैसेकि कुछ में एक वृत्‍ताकार प्रकोष्‍ठ है और भीतर की ओर स्‍तूप है, आयताकार बरामदे के साथ वृत्‍ताकार प्रकोष्‍ठ है।

एक बेतरतीब उत्‍खनन की एक कब्रिस्‍तान के रूप में पहचान की गई है जिसमें चट्टान को काट कर 14 स्‍तूप बनाए गए हैं। कुछ पर स्‍थविरों के नाम खुदे हुए हैं।

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