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वैशाली के प्राचीन अवशेष

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वैशाली के प्राचीन अवशेष

वैशाली का उल्लेख रामायण और बौद्घ साहित्य में मिलता है। वैशाली, भगवान महावीर का जन्म स्थान है और प्रारंभिक काल में यह लिच्छवियों की राजधानी थी। इस स्थान पर दूसरी बौद्घ सभा महात्मा बुद्घ की मृत्यु के लगभग सौ वर्ष बाद हुई थी। सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तंभ यहाँ मौजूद है। आजकल इसे आधुनिक बसाढ (मुज्जफरपुर जिला, बिहार) के साथ भी पहचाना जाता है।

इस स्थल का उत्खनन सन 1903-04 और 1913-14 में किया गया और यहां पर इस नगर के नाम से उत्कीर्ण मोहरें पायी गई थीं। यहां पर दोबारा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सन 1950 में और के.पी. जायसवाल अनुसंधान संस्थान द्वारा सन 1957-61 के बीच व्यवस्थित उत्खनन कार्य किया गया। यह एक बड़ा टीला है जिसे स्थानीय रूप से ‘राजा विशाल का गढ’ कहते हैं। इसकी पहचान आवासीय स्थल के रूप में से की गयी है जिसमें किलेबंदी वाला नगर-दुर्ग भी शामिल था।

साहित्यिक परम्परा (इतिहास) के अनुसार लिच्छवियों ने नगर के उत्तर-पश्चिम में महात्मा बुद्घ के अस्थि-अवशेषों के हिस्से पर एक मिट्टी के स्तूप का निर्माण करवाया जिसे इन अवशेषों का पुन: वितरण करने के वास्ते सम्राट अशोक द्वारा पुन: खोला गया था। इस स्तूप का चार गुणा विस्तार किया गया। इसे विस्तृत करने का पहला निर्माण कार्य मौर्य काल में केवल ईंटों से किया गया। ऐसा माना जाता है कि महात्मा बुद्घ के शारीरिक अवशेष वाली अस्थि-मंजूषा स्तूप के अंतरिक भाग में पायी गयी थी।

बसावट के आधार पर वैशाली को 500 शताब्दी ईसा पूर्व से 500 ईसवी तक चार कालों में विभाजित किया गया है जबकि राजा विशाल के गढ़ के उत्खनन से सांस्कृतिक कालानुक्रमानुसार इसके तीन काल दर्शाए गए हैं। एन0 बी0 पी0 (उत्तरी काले चमकीले मृदभांड) के ऊपर बना मूल परकोटा शुंगकाल में मिट्टी से भरकर बनाया गया था। कुषाण तथा गुप्त काल में सुरक्षा प्राचीर को पक्की ईंटों से जोड़कर और ऊँचाई प्रदान की गई थी।

इस स्थल पर पर्याप्त संख्या में सिक्के, मुहरें और मुद्रांक, लघु मृणमूर्तियाँ, आभूषण और अन्य वस्तुएं पाई गई हैं जो आमतौर पर आद्य-ऐतिहासिक स्थलों पर पाई गई हैं।

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