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अजन्ता गुफाएं

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अजन्ता गुफाएं (1983), महाराष्ट्र

अजन्ता गुफाएं (75° 40′ उत्तर, 20° 30′ पूर्व) जिला मुख्यालय, औरंगाबाद के उत्तर में 107
किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। इन गुफाओं का नाम, पास के गांव ‘अजिंठा’ के नाम पर रखा गया है जो यहां से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन गुफाओं की खोज 1819 में ब्रिटिश सेना की मद्रास रेजिमेन्ट के सेना अधिकारी द्वारा शिकार खेलने के अपने एक अभियान के दौरान की गई थी। शीघ्र ही यह खोज बहुत ही प्रसिद्ध हो गई और विश्‍व में अजन्ता ने महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल का दर्जा प्राप्त कर लिया। ये गुफाएं अपनी भित्ति-सज्जा के लिए प्रसिद्ध हैं जो भारतीय कला, विशेष रूप से चित्रकला के सूक्ष्म जीवंत उदाहरण हैं।

ये गुफाएं घोड़े की नाल के आकार की चट्टान की सतह पर खोदी गई हैं जो बाघोरा नामक एक संकीर्ण नदी के ऊपर लगभग 76 मीटर की ऊंचाई पर हैं। यह घाटी बौद्ध भिक्षुओं को शांत एवं स्वच्छ वातावरण उपलब्ध कराती थी जो वर्षा-काल के दौरान इन निश्‍चित स्थलों पर एकांतवास के लिए आया करते थे। इस एकांतवास में उन्हें लंबी अवधि के लिए बौद्धिक क्रियाविधि के जरिए अपने धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए भी काफी समय मिलता था। ये गुफाएं अलग अलग अवधियों (लगभग दूसरी सदी से लेकर छठी सदी ई. तक) में खोदी गईं। प्रत्येक गुफा सीढ़ी की एक श्रृंखला से जुड़ी हुई थी जो अब लगभग विलुप्त हो चुकी है। कुछ स्थानों पर इसके कुछ अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं।

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चट्टान को काटकर कुल 30 उत्खनन किए गए थे जिसमें से एक उत्खनन अधूरा है। इसमें से पांच (गुफा संख्या-9, 10, 19, 26 एवं 29) चैत्य गृह हैं और शेष विहार हैं। काल और शैली के आधार पर भी ये गुफाएं दो बड़े समूहों में विभाजित की जा सकती हैं। सबसे पहले के उत्खनन बौद्ध धर्म के हीनयान चरण के हैं जिसके सदृश उदाहरण भाजा, कोंडेन, पीतलखोरा, नासिक आदि में देखे जा सकते हैं। अजन्ता की कुल पांच गुफाएं इस चरण से जुड़ी हुई हैं अर्थात गुफा-9 एवं 10 जो चैत्यगृह हैं और गुफा-8, 12, 13 एवं 15 जो विहार हैं। ये गुफाएं ईसापूर्व काल की हैं और इन सब में से सबसे पहली गुफा सं.10 है जिसका काल दूसरी सदी ईसापूर्व है। यहां स्तूप की पूजा की जाती थी और ये गुफाएं लकड़ी की बनी हुई सी लगती हैं, यहां तक कि कड़ियों और शहतीरों पर भी नक्काशी की गई है हालांकि ये अब प्रयोग में नहीं हैं।

गुप्त साम्राज्य के समकालीन वाकाटक शासन काल में किया गया अतिरिक्त उत्खनन कार्य यहां देखा जा सकता है। ये गुफाएं वाकाटकों के अधीन राजसी संरक्षण और जागीरदारों द्वारा उत्खनित करवाई गई थीं जैसाकि गुफाओं में पाए गए अभिलेखों से पता चलता है। वाकाटक राजा हरिषेण (475-500 ईसवी) के मंत्री वराहदेव ने गुफा सं.16 बौद्ध संघ को समर्पित की थी जबकि गुफा सं.17 इसी राजा के सामंत राजकुमार (जिसने अश्‍मक को अपने अधीन किया था) का तोहफा था। अजन्ता में गतिविधियां 5वीं सदी ई. के मध्य से छठी सदी ई. के मध्य में हुई। प्रसिद्ध चीनी यात्री, ह्वेनसांग सातवीं सदी ई. के पूर्वार्ध में भारत आया था और यहां बौद्ध धर्म की समृद्ध संस्थापना का एक सुस्पष्ट और जीवंत विवरण छोड़ गया था हालांकि वह इन गुफाओं में गया ही नहीं था। गुफा संख्या 26 के एकमात्र राष्ट्रकूट अभिलेख से 8वीं-9वीं सदी ई. के दौरान इसे प्रयोग में लाए जाने का पता चलता है। मूर्तिकला और चित्रकला, दोनों के विन्यास में नए पैटर्न की शुरुआत और बुद्ध प्रतिमा की केंद्रीयता के कारण दूसरा चरण पहले चरण से अलग है।

अजन्ता के विश्व प्रसिद्ध चित्रों को दो व्यापक चरणों में देखा जा सकता है। पहले चरण के चित्र गुफा-9 एवं 10 में खंडित नमूनो के रूप में दिखाई देते हैं जो दूसरी सदी ईसा पूर्व के हैं। इन चित्रों में मूर्तियों के सिर के आभूषण और अन्य आभूषण, सांची और भरहुत की नक्काशी युक्त मूर्तियों से मिलते-जुलते हैं।

चित्रकारी का दूसरा चरण लगभग पांचवी-छठी सदी ई. से शुरू हुआ और अगली दो सदियों तक चलता रहा। वाकाटक काल के इन शानदार चित्रों के नमूने गुफा संख्या-1, 2, 16 एवं 17 में देखे जा सकते हैं। इन चित्रों की शैली और प्रदर्शन में परिवर्तन मुख्यतया इनके अलग-अलग कलाकारों के कारण भी देखा गया। कुछ चित्रों के प्रदर्शन में ह्रास देखा गया जिसका हमें बाद की अवधि के चित्रों में बुद्ध की कुछ स्तंभित, यांत्रिक, निर्जीव आकृतियों से पता चलता है। इन चित्रों का मुख्य विषय विभिन्न जातक कहानियों, बौद्ध के जीवन से जुड़ी विभिन्न घटनाओं, समकालीन घटनाओं तथा सामाजिक जीवन का चित्रण भी है। छत की सजावट में ज्यामितीय और वनस्पतीय सजावटी पैटर्न शामिल हैं।

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आरंभ में चट्टान की सतह को चित्र बनाने के लिए तैयार किया गया और उसके बाद चित्र बनाए गए। चट्टान की सतह पर छैनी से निशान (छोटे-छोटे गड्ढे) और खांचे बनाए जाते थे ताकि जो भी परत बनाई जाए वह उस पर अच्छी तरह से टिक सके। दीवार एवं छतों की खुरदरी सतह पर पहली परत में लोहमय मिट्टी की खुरदरी परत होती थी जिसमें पत्थर-मिट्टी या रेत, वनस्पति के रेशे, धान का भूसा, घास आदि भी मिले होते थे और साथ ही आर्गेनिक मूल की अन्य रेशेदार सामग्री भी लगाई जाती थी। पहली परत के ऊपर पत्थर के महीन बुरादे अथवा रेत और सूक्ष्म रेशेदार वनस्पति सामग्री के साथ मिश्रित गारे और लोहमय मिट्टी का दूसरा कोट लगाया जाता था। तत्पश्‍चात इस सतह पर चूने का पतला कोट करके इसे अंतिम रूप दिया जाता था। इस सतह पर मोटी-मोटी रेखाएं खींची जाती थी। फिर खाली जगहों को विभिन्न आभाओं में अपेक्षित रंगों से भरा जाता था और विभिन्न प्रकार की रंगत दी गई थी ताकि वे गोलाकार और प्लास्टिक की तरह दिखाई दें। यहां जिन रंगों और आभाओं का प्रयोग किया गया है वे लाल और पीले, गेरू, टेरा वर्टी से लेकर लाइम, केओलिन, जिप्सम, काजल एवं वैदूर्य तक भिन्न-भिन्न हैं। यहां चिपकाने वाले पदार्थ के रूप में मुख्यतया गोंद का इस्तेमाल किया गया है। अजन्ता के चित्र भित्ति चित्र नहीं है क्योंकि इन्हें किसी चिपकाने वाले पदार्थ की सहायता से चित्रित किया गया है, जबकि भित्ति चित्रों में चित्र उसी समय बनाए जाते हैं जब चूना गीला होता है जोकि मूलभूत चिपकाने वाले पदार्थ के रूप में कार्य करता है।

सुबह 9 से 5 बजे तक खुला है। सोमवार को बंद रहता है

प्रवेश शुल्क: भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक 40/- रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य: 600/- रूपए प्रति व्यक्ति
(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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