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विश्‍व विरासत स्थल-अजन्ता की गुफाएं- 01 से 29 के बारे में जानकारी

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गुफा सं. 1- यह एक चौकोर (35.7x 27.6 मीटर) मठ है जिसमें एक हॉल है जिसके चारों ओर 14 कोठरियां, ड्योढ़ी, गर्भगृह और एक बरामदा (19.5.7x 2.82x 4.1 मीटर) है जिसके बगल में प्रत्येक दिशा में एक-एक कक्ष है और एक खुला प्रांगण है जिसके पार्श्‍वों में दो कक्ष हैं। यह चौथी-पांचवीं शताब्दी का है। मुख्य रूप से इसके गर्भगृग में धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा (उपदेश मुद्रा) में बैठे बुद्ध की प्रतिमा है और यहां विश्व प्रसिद्ध पद्मपाणि एवं वज्रपाणी के चित्र हैं। इसके अतिरिक्त, इसमें शिबी, शखपाल, महाजनक, महा-उम्मग, चांपेय जातकों का चित्रण है और मार के प्रलोभन का दृश्य भी अंकित है।
गुफा सं. 2- इस मठ (35.7X21.6 मीटर) में कोठरियां, गर्भगृह और दो स्तंभ वाला उप मंदिर है जो छठी शताब्दी ई. का है जबकि धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा गर्भगृह में स्थापित है। पार्श्व में उप-मंदिर है जिसमें दो यक्षों की आकृतियां (जो शंखनिधि और पद्मनिधि के रूप में जाने जाते हैं) पूर्व में हैं और हरिती एवं उनकी पत्‍नी पांचिक दायीं ओर है। बड़े पैमाने पर चित्रित गुफा, छत पर बने चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। यहां विदुर पंडित एवं रूरू जातकों को चित्रित किया गया है और श्रावस्ती के चमत्कार; अष्टमहाभय; अवलोकितेश्‍वर; माया के स्वप्न को भी चित्रित किया गया है।

गुफा 3- यह अपूर्ण मठ (10.08x 8.78 मीटर) है और प्रारंभिक उत्खनन से केवल स्तंभों वाले बरामदे का ही पता चला है।

गुफा 4- इस चौकोर मठ में एक हॉल, गर्भगृह, स्तंभ वाला बरामदा है और यह छठी शताब्दी ईसवी के पूर्वार्ध का है। यह अजन्ता का सबसे बड़ा मठ है जो 35.08x 27.65 मीटर है। चौखट की विशेष रूप से शिल्पकारी की गई है जिसके दाईं ओर उत्कीर्णित बोधिसत्व को आठ महान संकटों से अपने उपासकों को संरक्षण प्रदान करते हुए दिखाया गया है। यहाँ गुफा में कभी रंग किया गया होगा जिसके अवशेष देखे जा सकते हैं। हॉल की छत में लावा प्रवाह की एक अद्भुत भू-वैज्ञानिक विशेषता संरक्षित है।

गुफा 5- यह मठ (10.32x 16.8 मीटर) अपूर्ण है। हालांकि यहां खूबसूरत नक्काशी वाली चौखटें और मकरों पर स्त्रियों की आकृतियां महत्वपूर्ण हैं।

गुफा 6- यह दो मंज़िला मठ (16.85x 18.07 मीटर) है जिसमें हॉल, गर्भगृह और निचली मंजिल पर स्तंभ वाला हॉल है और ऊपरी मंजिल पर एक हॉल है जिसमें कोठरियां हैं, उप कोठरियां और गर्भगृह है। दोनों मंदिरों में उपदेश की मुद्रा में बुद्घ की प्रतिमाएं है। श्रावस्ती के चमत्कार का अंकन और मार का प्रलोभन, महत्वपूर्ण चित्रकलाएं है। विभिन्न मुद्राओं और भाव-भंगिमाओं में बुद्ध का मूर्तिशिल्पगत चित्रण भी यहां देखा जा सकता है।

गुफा 7- इस मठ (15.55x 31.25 मीटर) में गर्भगृह, एक अंडाकार खुला हॉल है जिसमें दो छोटे द्वारमंडप हैं जिन्हें भारी अष्टभुजाकार स्तंभों से सहारा दिया गया है और आठ कक्ष हैं। उपदेश मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा मंदिर के अंदर स्थापित है। अन्य मूर्तिशिल्पगत पैनलों में श्रावस्ती के चमत्कार, नागमुचलिन्‍द आदि के संरक्षण में बैठी हुई अवस्था में बुद्ध की प्रतिमा है।

गुफा 8- अजन्ता में यह अपूर्ण मठ (15.24x 24.64 मीटर) सबसे निचले स्थल पर स्थित है और सभी मठों से पुराना मठ है। इस गुफा के अग्रभाग का मुख्य भाग भू-स्खलन में ढह गया था।

गुफा सं. 9- यह गजपृष्ठीय चैत्यगृह (18.24x 8.04 मीटर) दूसरी सदी ईसवी का है और यह बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा से संबंधित है। इस चैत्यगृह में एक प्रवेश द्वार है, दोनों ओर खिड़कियां हैं, एक केंद्रीय हाल है, मध्य भाग के दोनों ओर पार्श्‍व प्रदक्षिणाएं हैं जिन्हें 23 स्तंभों की कतारें अलग-अलग करतीं हैं और एक स्तूप है जिसमें पूजा की जाती थी।
चैत्यगृह, लकड़ी की वास्तुकला शैली के प्रतिरूप को प्रदर्शित करता है जो भीतर की ओर शुंडाकार अष्टकोणीय स्तंभों के रूप में है। साथ ही लकड़ी के शहतीर एवं कडियां आदि लगाने के साक्ष्य भी मिले हैं। यह चैत्य बाद की अवधि के दौरान प्रयोग में था जैसा कि अहाते की ओर वाली पार्श्‍व दीवारों और अग्रभाग पर बुद्ध की मूर्तियों से पता चलता है। चैत्य के अन्दर चित्रावली दो परतों में देखी जा सकती है। पूर्व की चित्रकला पहली सदी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध की है और दूसरी पांचवी-छठी सदी ईसवी की है।

गुफा सं. 10- अप्रैल 1819 में एक ब्रिटिश सेना अधिकारी, जान स्मिथ ने व्यू प्वाइंट से इस गुफा के विशाल महराब को देखा था जो अंतत: अजन्ता गुफाओं की खोज साबित हुई। यह गुफा अजन्ता में सबसे पहला चैत्यगृह है। अग्रभाग पर दूसरी सदी ईसा पूर्व के एक ब्राह्मी अभिलेख में ‘वसिष्ठिपूत काटाहादी’ लिखा गया है। इस गुफा (30.5x 12.2 मीटर) में एक बड़ा हाल है जिसके मध्य भाग में दो प्रदक्षिणाएं हैं जिन्हें 39 अष्टकोणीय स्तंभों की पंक्ति अलग-अलग करती है और गजपृष्ठ के किनारे पर पूजा के लिए स्तूप भी है। इस गुफा में दो अवधियों के चित्र हैं- पहले, दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के है और बाद के चौथी-छठी सदी ईसवी के हैं। इस अवधि की दो जातक कहानियों को पहचाना गया है नामत: शम (शमा) जातक और छदंत जातक। बाद की अवधि के चित्रों में मुख्यतया स्तंभों पर बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं में आकृतियां हैं।

गुफा सं. 11- इस मठ (19.87x 17.35 मीटर) का निर्माण काल 5वीं शताब्दी ईसवी के प्रारंभ का है। इसमें छह कक्षों वाला एक हॉल है और एक लंबा बैंच पड़ा है। चार कक्षों के साथ एक स्तंभ वाला बरामदा और एक गर्भगृह है। यहां एक अपूर्ण स्तूप के समकक्ष गर्भगृह में उपदेश की मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा रखी है। यहां उपलब्ध कुछ चित्रों में बोधिसत्वों, बुद्ध की आकृतियों आदि को दर्शाया गया है।

गुफा सं. 12- इस हीनयान मठ (14.9x 17.82 मीटर) में एक हॉल है जिसकी आगे की दीवार पूरी तरह से ढह चुकी है। इसके तीनों ओर बारह कक्ष बनाए गए थे। मठ के पीछे की दीवार पर अंकित शिलालेख में इस गुफा को एक व्यापारी, घनमदाद द्वारा भेंट में देने का उल्लेख मिलता है और यह पुरालिपि शास्त्र के अनुसार दूसरी-पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है जो कि शायद गुफा-10 के निर्माण काल से कुछ बाद का होगा। द्वार मुख के ऊपर कक्ष का अग्रभाग चैत्य खिड़की के मूलभाव से सज्जित है।

गुफा सं. 13- यह एक छोटा सा मठ है और यह पहले चरण से जुड़ा है। इसमें तीनों ओर सात कक्षों वाला स्तंभहीन हॉल है। इन कक्षों में पत्थर को काटकर बिस्तर बनाए गए हैं।

गुफा सं. 14- इस अपूर्ण मठ (13.43x 19.28 मीटर) को ऊंचे स्तर पर गुफा सं. 13 के ऊपर से खोदकर निकाला गया था। मूलत: इसकी बड़े पैमाने पर योजना बनाई गई थी। द्वार मार्ग के ऊपरी कोनों पर शाल भंजिकाओं का चित्रण बड़ा ही सुन्दर है।

गुफा सं. 15- इस मठ (19.62x 15.98 मीटर) में आठ कक्षों वाला स्तंभहीन हॉल है। ड्योढ़ी, गर्भगृह और एक स्तंभ वाला बरामदा भी है। मूर्तिशिल्प के चित्रण में विभिन्न भंगिमाओं में बुद्ध, गर्भगृह में सिंहासन पर बैठे बुद्ध की प्रतिमा शामिल है। इन चित्रों के अवशेष यह संकेत देते हैं कि इन चित्रों को मूल रूप से चित्रित किया गया था।

गुफा सं. 15 क- अजन्ता में खोदकर निकाली गई इस सबसे छोटी गुफा में एक छोटा स्तंभ रहित हॉल है जिसके तीनों ओर एक-एक कोठरी है। इसकी सामने की दीवार पर पुराने पात्रों मे शिलालेख थे (जो अब लुप्त हो चुके हैं)। इस हाल को चैत्य खिड़की पैटर्न से उभारा गया है जिसका आरंभ वेदिका पैटर्न से हुआ था।

गुफा सं. 16- यहां प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार इस गुफा का उत्खनन कार्य वाकाटक राजा, हरिषेण (लगभग 475.500 ई.) के मंत्री वराहदेव द्वारा कराया गया था। यह गुफा (19.5x 22.25x 4.6 मीटर) एक मठ है जिसमें एक केंद्रीय हॉल है और जिसके तीनों ओर 14 कक्ष हैं। साथ ही ड्योढी और गर्भगृह में बुद्ध की प्रतिमाएं हैं। नन्द के रूपान्तरण, सरस्वती के चमत्कार, माया के स्वप्न और बुद्ध के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाएं यहां चित्रित किए गए कुछ महत्वपूर्ण विषय हैं। हस्ति, महा-उम्मग्ग, महा-सुतसोम यहां चित्रित की गईं जातक कहानियां हैं। चित्रित अभिलेख इन गुफाओं के अन्दर देखे जा सकते हैं।

गुफा सं. 17- यहां मिले ब्राह्मी शिलालेख में वाकाटक राजा हरिषेण के सामन्ती युवराज द्वारा इस गुफा की खुदाई करने का प्रमाण मिलता है। इस मठ (34.5x 25.63 मीटर) में एक बड़ा हाल है जो तीनों ओर से 17 कक्षों से घिरा हुआ है। इसमें एक ड्योढ़ी और गर्भगृह है जिसमें बुद्ध की मूर्ति है। इस गुफा में वाकाटक काल के कुछ चित्रों को परिरक्षित करके रखा गया है जिनमें वेस्सन्तर जातक, (दरवाजे के दाईं ओर) एक बहुत बड़ा विशाल पहिया है जो जीवन चक्र का द्योतक है; उड़ती हुई अप्‍सरा (दरवाजे के बाईं ओर), बुद्ध द्वारा राजगृह में नल गिरि (एक जंगली हाथी) को वश में करते हुए, मंडली सभा को उपदेश देते हुए बुद्ध शामिल है। यहां अंकित किए गए जातकों में छद्दन्त महाकपी (दो रूपों में), हस्ति, हँस, वेस्संतर, महा-सुतसोम, सरभ-मृग, मच्छ, माटी-पोषाक, साम, महिष, बालहास, शिबी, रुरू एवं निग्रोध मृग शामिल हैं।

गुफा सं. 18- इसमें आयताकार उत्खनन (3.38x 11.66 मीटर) है जो अन्य कक्ष तक जाता है। इस हॉल में खांचेदार आधारों और अष्टकोणीय शाफ्टों वाले दो स्तम्भ हैं।

गुफा सं. 19- इस चैत्यगृह (16.05x 7.09 मीटर) का निर्माण काल 5वीं सदी ईसवी है और यह गंधकुटी हो सकता है। स्तूप पर बुद्ध की खड़ी अवस्था में 7 मूर्तियां उत्कीर्णत की गई हैं। यह गुफा अपने अग्रभाग की श्रेष्ठ मूर्तिशिल्प सजावट और विशेष रूप से चैत्य वातायन (तोरण) की दूसरी तरफ यक्ष की दो आदमकद प्रतिमाओं के लिए जानी जाती है। इस गुफा में बने हॉल को विभिन्न भंगिमाओं में बुद्ध को चित्रित किया गया है।

गुफा सं. 20- इस स्तंभहीन मठ (16.2x 17.91 मीटर) में हॉल, कक्ष, गर्भगृह और एक स्तंभ वाला बरामदा है। इसका निर्माण काल 450- 525 ई. सन के बीच माना जाता है। बरामदे में मौजूद अभिलेख में किसी उपेन्द्र द्वारा मंडप को तोहफे के रूप में दिए जाने का उल्लेख दर्ज है। उपदेश की मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा मंदिर में रखी गई है। अनुचरों के साथ बुद्ध की 7 मूर्तियां इस गुफा में अन्य महत्वपूर्ण शिल्पकला विषयक पैनल हैं।

गुफा सं. 21- इस मठ (28.56x 28.03 मीटर) में एक हॉल है जिसमें 12 स्तंभ और तीनों ओर 12 कक्ष, गर्भगृह, एक स्तंभ वाला बरामदा (स्तंभों को पुन: स्थापित किया गया है) शामिल हैं। इन 12 कक्षों में से 4 कक्षों में स्तंभों वाले द्वारमंडप हैं। चैत्‍य में बुद्ध को धर्मोंपदेश देते हुए बैठी हुई अवस्था में दिखाया गया है। ऐसे चित्रों के अवशेष भी मिले हैं जिसमें एक पैनल पर धर्मसंघ को उपदेश देते हुए बुद्ध को चित्रित किया हुआ है।

गुफा सं. 22- इस मठ (12.72x 11.58 मीटर) में स्तंभहीन हॉल, चार अपूर्ण कक्ष, गर्भगृह और एक संकरा बरामदा है। प्रलंबपाद-आसन में बैठे बुद्ध की प्रतिमा को चैत्‍य की पिछली दीवार पर उकेरा गया है। विभिन्न रूपों में बुद्ध का मूर्तिशिल्पगत अंकन, मैत्रेय के साथ मानुषी-बुद्धों की चित्रित आकृतियों को भी यहां देखा जा सकता है।

गुफा सं. 23- यह (28.32x 22.52 मीटर) एक अपूर्ण मठ है और इसमें स्तंभहीन हॉल, गर्भगृह, उपकक्ष एवं बगल में बने कक्ष और स्तंभ वाला एक बरामदा है। यह गुफा स्तंभों और भिति स्तंभों की शानदार सजावट और नाग द्वारपालों के लिए प्रसिद्ध है।

गुफा सं. 24- यह (29.3x 29.3 मीटर का) अपूर्ण मठ है और गुफा 4 के बाद अजन्ता में उत्खनन में मिली दूसरी सबसे बड़ी गुफा है। नक्शे के अनुसार इसमें एक हॉल है जिसमें एक स्तंभ वाला बरामदा और गर्भगृह शामिल है। खुदाई में बरामदे के बाहर स्तंभ वाले द्वारमंडप के साथ एक प्रार्थनालय भी मिला है। चैत्‍य में प्रलंबपाद-आसन में बुद्ध की प्रतिमा है।

गुफा सं. 25- इस मठ (11.37x 12.24 मीटर) में स्तंभहीन हॉल, एक स्तंभ वाला बरामदा और घेरे में एक प्रांगण है। इसकी बहुत ऊंचाई से खुदाई की गई है। बरामदे के बाईं ओर दो कक्ष देखे गए हैं और हॉल में कोई कक्ष नहीं है। हॉल में चैत्‍य भी नहीं है।

गुफा सं. 26- यह चैत्यगृह, गुफा संख्या 19 से काफी मिलता-जुलता है लेकिन इसका व्यास (25.34x 11.52 मीटर) काफी बड़ा है और यहां मूर्तियां अधिक उत्कृष्टता और सजीवता से उकेरी गईं हैं। आगे के बरामदे की दीवार पर पाए गए अभिलेख (450-525 ईसवी सन्) में अश्‍मक (विदर्भ) के राजा के एक मंत्री, भाविराज के मित्र, बुद्ध भद्र भिक्षु द्वारा इस चैत्यगृह को भेंट में देने का उल्लेख मिलता है। चैत्यगृह में एक हॉल, पार्श्‍व वीथी (प्रदक्षिणा) और पत्थर को काटकर बनाया गया एक स्तूप है जिसके आगे के भाग में बुद्ध की प्रतिमा है। अग्रभाग, आंतरिक स्तंभ, गलियारे (स्तंभ एवं छत के महराब के बीच), गलियारों की पार्श्‍व दीवारों पर प्रतिमाएं और सजावटी डिजाइन उकेरे गए हैं। तथापि, सबसे आश्‍चर्यजनक और प्रमुख प्रतिमा बुद्घ के महापरिनिर्वाण की है जो दायीं ओर की पार्श्‍व वीथिका वाली दीवार पर बनी है और बुद्ध की तपस्या के दौरान मार के हमले के दृश्य भी उसी दीवार पर चित्रित हैं।

गुफा सं. 27- यह गुफा, गुफा संख्या 26 का भाग हो सकता है और यह दो मंज़िली है। ऊपर की मंजिल आंशिक रूप से ढह चुकी है। इस मठ में एक हॉल है जिसमें चार कक्ष, ड्योढ़ी एवं गर्भगृह है। गर्भगृह के भीतर बुद्ध की उपदेश देने की मुद्रा में एक प्रतिमा है।

गुफा सं. 28- यह एक अपूर्ण मठ है जिसमें केवल एक स्तंभ वाला बरामदा ही खुदाई में मिला।

गुफा सं. 29- यह एक अपूर्ण चैत्यगृह (22.8x 12.84 मीटर) है जो खुदाई के पहले चरण में मिला था और यह गुफा 20 और 21 के बीच उच्चतम स्तर पर स्थित है।

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