प्रकाशन

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भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण, पुरालेख और मुद्राशास्‍त्र के अलावा, आरंभ से उत्‍खनन में अनुसंधान, खोज, संरक्षण, मंदिरों और धर्म-निरपेक्ष भवनों के वास्‍तुकला सर्वेक्षण जैसे विषयों पर वार्षिक और विशेषांक दोनों की अनेक पुस्‍तकें प्रकाशित करता है। इसके अलावा, यह सर्वेक्षण केन्‍द्रीय रूप से संरक्षित स्‍मारकों और पुरातत्‍वीय स्‍थलों पर गाइड पुस्‍तकों, फोल्‍डर/विवरणिका, पोर्टफोलियो और चित्र-पोस्‍टकार्डों के रूप में लोकप्रिय साहित्‍य को प्रकाशित करता हे। ए एस आई द्वारा प्रकाशित विभिन्‍न श्रृंखलाओं तथा उनके बिक्री मूल्‍य, निबंधन एवं शर्तों तथा बिक्री आउटलेटों के पतों के ब्‍यौरे नीचे दिए गए हैं।
 
ए एस आई का प्रकाशन ए. कनिंघम, प्रथम महानिदेशक द्वारा आरंभ किया गया, जिन्‍होंने अपने सहयोगियों के साथ 1862-63 से आगे अपने भ्रमण के सभी निष्‍कर्षों को गंभीरतापूर्वक दस्‍तावेज के रूप में तैयार किया। 1874 में, पुरालेख अवशेषों पर विस्‍तृत शोध वाली ”नई साम्राज्‍य श्रृंखला” नामक एक नई श्रृंखला आरंभ की गई जो 1933 तक जारी रही।

जॉन मार्शल ने 1902 के बाद दो भागों में प्रकाशित वार्षिक रिपोर्टों को लागू किया। उन्‍होंने ”भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण के संस्‍मरण” नामक नई श्रृंखला का प्रकाशन भी आरंभ किया, जिसमें से सर्वप्रथम 1919 में प्रकाशित हुआ तथा नवीनतम (98वां) 2003 में प्रकाशित हुआ। तीन आने वाले खंड हैं जैसे नागार्जुनकोंडा-II, आदम और उदयगिरी उत्‍खनन रिपोर्टें, जो मुद्रण के विभिन्‍न चरणों में हैं।
 
भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण की बुलेटिन ”प्राचीन भारत” 1946 में आरंभ की गई, जिसमें भारत और निकटवर्ती देशों में पुरातत्‍व विज्ञान के विभिन्‍न पहलुओं पर सामान्‍य और शोध संबंधी लेख होते थे।

”भारतीय पुरातत्‍व 1953-54- एक समीक्षा” का प्रथम अंक 1946 में प्रकाशित किया गया, जो प्रत्‍येक वर्ष भारत में किए गए सभी महत्‍वपूर्ण पुरातत्‍व संबंधी कार्यकलापों के बारे में जानकारी प्रदान करता है। नवीनतम प्रकाशित अंक 1999-2000 का है और वर्ष 2000-01 और 2001-02 के दो अंक प्रेस में हैं। शेष अंक तैयारी के विभिन्‍न चरणों में हैं।

भारतीय मंदिर वास्‍तुकला पर विनिबंध भी ”मंदिरों का वास्‍तुकला सर्वेक्षण” श्रृंखला के तहत प्रकाशित किया जा रहा है। इस विभाग ने विशेष प्रकाशन श्रृंखला के तहत भी अनेक प्रकाशन किया। स्‍मारकीय धरोहर को रेखांकित करते हुए एक नई श्रृंखला ”पोर्ट-फोलियो” भी आरंभ की गई है। इसका एक अंक ”लद्दाख” पर प्रकाशित किया गया है। इनके अलावा, विश्‍व धरोहर श्रृंखला के तहत केन्‍द्रीय रूप से संरक्षित मार्गदर्शन पुस्‍तक तथा चित्र पोस्‍टकार्ड भी प्रकाशित किए गए हैं।

पुरालेखीय प्रकाशनों को भी समान महत्‍व दिया जा रहा है। उनमें से सबसे महत्‍वपूर्ण, संस्‍कृत शिलालेखों के लिए ”इपिग्राफिका इंडिका” पहली बार 1892 में प्रकाशित हुई। अब तक 42 खंडों का प्रकाशन हो चुका है। अरबी और फारसी शिलालेखों के क्षेत्र में, ”इपिग्राफिका इंडोमोरलोमिका” का प्रकाशन किया जा रहा है। ”भारतीय पुरालेख पर वार्षिक रिपोर्ट” 1887 से 1995-96 तक प्रकाशित की गयी है, जिसमें प्रत्‍येक वर्ष की गई पुरालेखी खोज की रिपोर्टें है। इनके अलावा, ”कारपस इन्‍क्रीप्‍सनम इंडिकेरम” श्रृंखला के तहत विभिन्‍न साम्राज्‍यों के शिलालेखों का भी प्रकाशन किया गया। दक्षिण भारत के पुरालेख अभिलेखों के लिए एक अलग श्रृंखला ‘दक्षिण भारतीय पुरालेख’ भी 1980 से प्रकाशित की जा रही है। दक्षिण भारतीय पुरालेखों के बारे में ”दक्षिण भारतीय पुरालेख की वार्षिक रिपोर्ट” नामक दूसरी श्रृंखला में भी 1905 से 1946 तक का वर्णन किया गया है, जिसमें किसी खास वर्ष के दौरान संग्रहित दक्षिण भारत के पुरालेखों पर संक्षिप्‍त टिप्‍पणियां हैं।

भारत की स्‍वतंत्रता के 50 वर्षों के दौरान भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण ने भी ‘राष्‍ट्रीय महत्‍व के स्‍मारकों और स्‍थलों की सूची’ तैयार और प्रकाशित करना आरंभ किया है, जिसमें विभिन्‍न सर्किलों के अन्‍तर्गत केन्‍द्रीय रूप से संरक्षित स्‍मारकों और स्‍थलों के ब्‍यौरे तथा उनकी आयोजना और फोटोग्राफ हैं, ताकि यह धरोहर प्रशासकों, विद्वानों और पर्यटकों की जरूरतों को पूरा कर सके। इस श्रृंखला में खंड-I, भाग-1 (श्रीनगर सर्किल), भाग 2 (चंडीगढ़ सर्किल) और भाग 3 (दिल्‍ली सर्किल) प्रकाशित किए गए हैं, और खंड-II, भाग-1 (जयपुर सर्किल) और खंड-VII, भाग-3 (त्रिशूर सर्किल) प्रेस में हैं।

व्यापार पूछताछ के लिए कृपया लिखें:

निदेशक (प्रकाशन),
महानिदेशक का कार्यालय,
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,
24, तिलक मार्ग, नई दिल्ली –
110 001 ईमेल:
asipublication@gmail.com
फोन: 011-23075355

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