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हुमायूँ का मकबरा

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हुमायूँ का मकबरा (1993) दिल्ली

हुमायूँ की मृत्यु 1556 में हुई और हाजी बेगम के नाम से जानी जाने वाली उनकी विधवा, हमीदा बानू बेगम ने मृत्‍यु के 9 वर्ष बाद, सन् 1565 में इस मकबरे का निर्माण शुरू करवाया जो 1572 में पूरा हुआ। पूर्ण मुगल शैली का यह प्रथम सुस्पष्ट उदाहरण है जो इस्‍लामी वास्‍तुकला से प्रेरित था। यह सुविदित है कि हुमायूँ ने अपने निर्वासन के दौरान फारसी स्थापत्य कला के सिद्धांतो का ज्ञान प्राप्त किया था और शायद स्वयं ही इस मकबरे की योजना बनाई थी। हालांकि इस आशय का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। इस मकबरे का निर्माण 15 लाख रूपए (1.5 मिलियन) की लागत से हुआ था।हुमायूँ की मृत्यु 1556 में हुई और हाजी बेगम के नाम से जानी जाने वाली उनकी विधवा, हमीदा बानू बेगम ने मृत्‍यु के 9 वर्ष बाद, सन् 1565 में इस मकबरे का निर्माण शुरू करवाया जो 1572 में पूरा हुआ। पूर्ण मुगल शैली का यह प्रथम सुस्पष्ट उदाहरण है जो इस्‍लामी वास्‍तुकला से प्रेरित था। यह सुविदित है कि हुमायूँ ने अपने निर्वासन के दौरान फारसी स्थापत्य कला के सिद्धांतो का ज्ञान प्राप्त किया था और शायद स्वयं ही इस मकबरे की योजना बनाई थी। हालांकि इस आशय का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है। इस मकबरे का निर्माण 15 लाख रूपए (1.5 मिलियन) की लागत से हुआ था।

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एक फारसी वास्‍तुकार, मिराक मिर्जा गियासबेग को इस मकबरे के लिए हाजी बेगम ने नियुक्त किया था।

यह मकबरा एक वर्गाकार उद्यान के केंद्र में अवस्थित है और चारबागों द्वारा चार मुख्य भागों में विभाजित है जिसके केंद्र में उथले जल-प्रणाल हैं। रोड़ी से निर्मित ऊंचे अहाते में पश्चिम और दक्षिण में ऊंचे दो मंजिला प्रवेश मार्गों के माध्यम से प्रवेश किया जाता है। एक बारादरी (मंडप) पूर्वी दीवार के केंद्र में है और उत्तरी दीवार के केंद्र में एक हमाम (स्नान घर) है।

लाल बलुआ पत्थर से निर्मित मकबरे की खांचेदार कोनों वाली दो मंजिला संरचना, 7 मीटर ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर खड़ी है जो अनेक प्रकोष्ठों की श्रृंखला के ऊपर उठती जाती है जिन तक प्रत्‍येक ओर के तोरणपथों से पहुंचा जा सकता है। कब्र इस प्रकोष्ठ परिसर के केंद्र में है जिस तक दक्षिण की ओर के एक मार्ग से पहुंचा जाता है। अष्टकोणीय केंद्रीय कक्ष में स्मारक है और तिरछे पार्श्‍व कोण-कक्षों की ओर जाते हैं जिसमें शाही परिवार के अन्‍य सदस्यों की कब्रें हैं। बाहृय रूप से मकबरे का प्रत्‍येक पार्श्‍व, इसके ऊंचाई वाले हिस्से, संगमरमर के बार्डरों और पैनलों द्वारा अलंकृत हैं और उनमें तीन चाप वाले आलों की प्रधानता है, बीच का आला सबसे ऊंचा है। छत के ऊपर, केंद्र में ऊंचे प्रबलित दोहरे गुम्‍बद के चारों ओर स्तंभयुक्त मंडप बनाए गए हैं। केंद्रीय अष्टकोणीय कक्ष में स्मारक है जिसके आसपास विकर्णो पर अष्टकोणीय कक्ष हैं और पार्श्वों में चापित लाबी है। इनके द्वार छिद्रित आवरणों से बंद हैं। प्रत्येक पार्श्‍व तीन चापों से घिरा है, केंद्रीय चाप सबसे ऊंची है। दूसरी मंजिल पर भी यही वास्तुयोजना दोहराई गई है। संगमरमर के दोहरे गुम्‍बद (42.5 मीटर) से आच्‍छादित छत के चारों ओर स्‍तंभयुक्‍त छतरियां हैं।

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मकबरा फारसी वास्‍तु कला तथा भारतीय परंपराओं का मिश्रण है- आले, कॉरीडोर और ऊंचे दोहरे गुम्बद फारसी वास्‍तु-कला के उदाहरण हैं और छतरियां भारतीय वास्तु-कला के नमूने हैं जिससे दूर से यह पिरामिड की भाँति दिखाई देता है। हालांकि सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.) का मकबरा भारत में बनने वाला पहला उद्यान-मकबरा था, लेकिन हुमायूँ के मकबरे ने ही एक नई स्‍थापत्‍य परंपरा का सूत्रपात किया जिसकी सर्वोत्तम उपलब्धि आगरा का ताजमहल है। इन दोनों इमारतों के पीछे उभयनिष्‍ठ मानव प्रेरणा है कि एक का निर्माण एक समर्पित पत्‍नी ने अपने पति के लिए करवाया और दूसरे का निर्माण एक इतने ही या इससे अधिक समर्पित पति ने अपनी पत्नी के लिए करवाया।

मुगल वंश के अनेक शासक यहां दफन हैं। अन्‍तिम मुगल शासक, बहादुरशाह जफर ने अपने तीन शहजादों के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) के दौरान इस मकबरे में शरण ली थी।

इस मकबरे की दक्षिण-पश्‍चिमी दिशा में नाई का गुम्‍बद स्थित है जो एक ऊंचे चबूतरे पर बना है और जिस तक दक्षिण से सात सीढियों द्वारा पहुंचा जाता है। यह भवन वास्‍तु-योजना में वर्गाकार है और इसमें दोहरे गुम्मद से आच्‍छादित एक कक्ष है।

स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।

प्रवेश शुल्क:- भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगला देश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 30/-रूपए प्रति व्यक्ति
अन्य 500/-रूपए प्रति व्यक्ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)।

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