हम्‍पी स्‍मारक समूह (1986), कर्नाटक

हम्‍पी स्‍मारक समूह (1986), कर्नाटक

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पारंपरिक रूप से किष्‍किंधा के पम्‍पा क्षेत्र के नाम से ज्ञात हम्पी, तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर स्‍थित है। यह कभी शक्‍तिशाली विजय नगर साम्राज्य की गद्दी हुआ करती थी।

विजय नगर जिसे संत, विद्यारण्‍य के सम्‍मान में विद्यानगर के रूप से भी जाना जाता था, के स्‍मारक हरिहर-1 से सदाशिव राय तक के समय में 1336-1570 ई. सन् के दौरान बनाए गए थे। वंश के महानतम शासक, कृष्‍णदेव राय (1509-30 ई.) द्वारा बड़ी संख्‍या में शाही इमारतें बनवायी गईं। इस अवधि के दौरान बड़े स्‍तर पर हिन्‍दू धर्म, कला, वास्‍तुकला का पुनरुत्‍थान हुआ। अरबिया, इटली, पुर्तगाल और रूस जैसे दूर-दराज के देशों से आये समकालीन इतिहासकारों ने इस साम्राज्‍य का भ्रमण किया और इस नगर का आलेखी व आकर्षक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। यह लगभग 26 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है और यह बताया जाता है कि यह किलेबंदी की सात पंक्‍तियों द्वारा घिरा हुआ था।

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महलों के विस्‍तृत अवशेष, प्राचीन विजयनगर के सबसे भीतरी घेरे के अंदर देखे जा सकते हैं। विभिन्‍न धार्मिक और धर्म-निरपेक्ष इमारतें जैसेकि हिन्‍दू और जैन मंदिर, राजा का श्रोता हॉल, उत्‍सवों और अन्‍य कार्यक्रमों को देखने के लिए शानदार सिंहासन-मंच, राज तुला (तुला भार) विस्‍मयकारी हैं।

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इस नगर के मंदिर अपने बड़े आयामों, सुंदर अलंकरण, बड़े और महीन उत्‍कीर्णनों, बड़े स्‍तम्‍भों, शानदार मण्‍डपों, प्रतिमाओं और पारंपरिक चित्रणों की अपार संपदा के लिए जाने जाते हैं जिनके विषय रामायण और महाभारत से लिए गए हैं। सबसे पहला मंदिर पम्‍पापति का है (जिसमें पूजा की जाती है) जिसका बड़े स्‍तर पर पुनरुद्धार किया गया है। इसका शानदार प्रवेश द्वार कृष्‍ण देव राय द्वारा बनाया गया था। विट्ठल मंदिर विजयनगर शैली का सर्वोत्तम उदाहरण है। लक्ष्‍मी, नरसिम्‍हा और गणेश की एकाश्‍म मूर्तियां अपने बृहदाकार और भव्‍यता के लिए जानी जाती हैं।

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कृष्‍ण मंदिर, पट्टाभिराम मंदिर, हजारा रामचन्‍द्र और चन्‍द्रशेखर मंदिर तथा साथ ही जैन मंदिर अन्‍य उदाहरण हैं। अधिकांश मंदिरों में लम्‍बे-चौड़े बाजारों की व्‍यवस्‍था थी जो मंजिलों वाले मण्‍डपों द्वारा दोनों ओर से घिरे थे। धर्म-निरपेक्ष इमारतों में जनाना बाड़े का उल्‍लेख किया जा सकता है जिसमें रानी के महल का एक विशाल प्रस्‍तर तहखाना और कमल मंदिर नामक एक अलंकृत मण्‍डप ही सुविधा-संपन्‍न अन्‍त:पुर के अवशेष हैं। आकर्षक उठान वाले किनारे के बुर्ज, धननायक का बाड़ा (खजाना), सुन्‍दर कलात्‍मक पैनलों वाला महानवमी डिब्‍बा, अनेक प्रकार के तालाब और जलाशय, मण्‍डप, हाथियों के अस्‍तबल और स्‍तंभयुक्‍त मण्‍डपों की पंक्‍ति इस नगर के महत्‍वपूर्ण वास्‍तुकलात्‍मक अवशेषों में से कुछ एक हैं।

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स्‍थल पर हाल के उत्‍खनन से बड़ी संख्‍या में आलीशान परिसर और अनेक प्लेटफार्मों के तहखाने प्रकाश में आये हैं। दिलचस्‍प प्राप्‍तियों में बड़ी संख्‍या में गोल और उभार वाली प्रस्‍तर मूर्तियां, सुन्‍दर टेराकोटा वस्‍तुएं और गचकारी आकृतियां शामिल हैं जो कभी महलों को परिसज्‍जित किया करती थीं। इसके अलावा, सोने और तांबे के अनेक सिक्‍के, घरों में प्रयुक्‍त होने वाले बर्तन, महानवमी डिब्‍बे के दक्षिण-पश्‍चिम में एक वर्गाकार-सीढ़ीदार सरोवर, बड़ी संख्‍या में उत्कृष्ट चीनी मिट्टी की वस्तुओं सहित मिट्टी की वस्‍तुएं और दूसरी-तीसरी ईसवी की उत्‍कीर्णित बौद्ध मूर्तियां पाई गई हैं।

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स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक खुला रहता है।

प्रवेश शुल्क:- भारतीय नागरिक और सार्क देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव और अफगानिस्तान) और बिमस्टेक देशों (बंगलादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, थाईलेंड और म्यांमार) के पर्यटक- 30/- रुपए प्रति व्यक्ति
अन्‍य:- 500/- रूपए प्रति व्‍यक्‍ति

(15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश नि:शुल्क है)

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