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चोल मंदिर बृहदीश्वर

चोल मंदिर बृहदीश्वर

विशाल जीवंत चोल मंदिर
तंजावुर स्थित बृहदीश्वर मंदिर; गंगईकोंडाचोलीश्वरम मंदिर;
और दारासुरम स्थित ऐरावतेश्वर मंदिर ( 1987-2004), तमिलनाडु
विश्व विरासत सूची में दर्ज करने की तिथि: 1987; विस्तार:2004

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तंजावुर स्थित प्रसिद्घ शैव मंदिर जिसे बृहदीश्वर और दक्षिणमेरू कहा जाता है, चोल सम्राट राजराजा (985-1012 ई.) की महानतम रचना है। इसका शुभारंभ सम्राट ने स्वयं अपने शासन के 19वें वर्ष (1009-1010 ई.) के दौरान किया था और इसका नाम उसने अपने ही नाम पर राजेश्वर पेरूवुदय्यार रखा। स्थापत्य कला की दृष्टि से यह सर्वाधिक महत्वाकांक्षी संरचनात्मक मंदिर है जो ग्रेनाइट से बना है। दक्षिण भारत में स्थापत्य कला के विकास में इस मंदिर को एक युगांतकारी घटना माना गया है और इसके विमान को ‘समग्र रूप में भारतीय स्थापत्य कला की कसौटी’ माना गया है। यह मंदिर 240.9 मीटर लंबी (पूर्व-पश्चिम) तथा 122 मीटर चौड़ी (उत्तर-दक्षिण) विशाल आंतरिक प्राकार के भीतर स्थित है और इसमें पूर्व में एक गोपुर और तीन अन्य साधारण तोरण प्रवेशद्वार हैं जिनमें से एक-एक पार्श्विक दिशाओं में और तीसरा पीछे की ओर है। प्राकार परिवारालयों सहित एक दोमंजिली मालिका द्वारा घिरा हुआ है। यह मंदिर अपने विशालाकार अनुपातों और डिजाइन की सादगी के चलते भवन-निर्माण कला में न केवल दक्षिण भारत में बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भी भावी डिजाइनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।

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इसका शिखर एक गुमटीदार गुम्बद है जो अष्ट कोणीय है और ग्रेनाइट के एक ही खंड पर टिका है जो 7.8 मीटर का वर्गाकार खंड है और जिसका भार 80 टन है। भव्य उपपीठ और अधिष्ठान, अर्धमहा और मुख-मंडपों जैसी अक्षीय रूप से निर्मित समस्त इमारतों के लिए सामान्‍य हैं और मुख्य पूजास्थल से जुड़े हैं किन्तु इसमें अर्धमंडप को पार करते हुए एक उत्तर-दक्षिण अनुप्रस्थ भुजा के बीच में से पहुंचा जा सकता है जिसके ऊंचे सोपान हैं। गढ़त वाली प्लिंथ व्यापक रूप से अपने शाही निर्माता द्वारा अभिलेखों से उत्कीर्णित की गई है जिनमें उसके धार्मिक एवं कल्याणकारी कार्यों और मंदिर से संबंधित सांगठनिक कार्यक्रमों का उल्लेख है। पूजा स्थल के भीतर ही 8.7 मीटर ऊंचा विशाल लिंग है। दीवार में बने आलों और भीतरी मार्गों में दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और शिव के भिक्षाटन, वीरभद्र, कालांतक, नटेश, अर्धनारीश्वर और आलिंगन रूपों की आदमकद चित्रकलात्मक प्रतिमाएं मौजूद हैं। भीतर की ओर निचले प्रदक्षिणा पथ की दीवारों पर भित्तिचित्र हैं जो चोल तथा उसके बाद की अवधियों के सर्वोत्तम नमूने हैं जिनमें पौराणिक दृश्यों सहित समकालीन दृश्यों को भी चित्रित किया गया है।

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एक स्थानीय मराठा शासक, सरफोजी ने गणपति मंदिर का पुन: निर्माण करवाया। नायकों के प्रसिद्घ तंजावुर स्कूल आफ पेंटिंग्स की छाप चोल भित्ति चित्रों में व्यापक रूप से देखी जा सकती है। चित्रकला तथा अभिलेखों की दृष्टि से यह मंदिर समृद्घ है जिनमें उपलब्धियों, वित्तीय प्रबंधन और दान को दर्शाने वाली घटनाओं का चित्रण किया गया है और समकालीन समाज के प्रभाव का लेखा जोखा उपलब्ध कराया गया है।

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सन् 1987 में विश्‍व विरासत सूची में दर्ज किये गये 11वीं सदी के बृहदीश्‍वर मंदिर के साथ 11वीं और 12वीं सदी के दो अन्‍य चोल मंदिर जोड़े गये। विशाल जीवंत चोल मंदिर चोल साम्राज्य के शासकों द्वारा बनवाए गए थे। चोल साम्राज्‍य पूरे दक्षिण भारत में तथा पड़ोसी द्वीपों तक फैला हुआ था। इस स्थल में अब 11वीं और 12वीं सदी के तीन विशाल चोल मंदिर- तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, गंगईकोंडाचोलपुरम मंदिर और दारासुरम स्थित ऐरावतेश्वर मंदिर हैं।

राजेंद्र-I द्वारा निर्मित गंगईकोंडाचोलपुरम मंदिर 1035 ई. में पूर्ण हुआ। इसके 53 मीटर के विमान के कोने पश्चगामी हैं और उनमें ऊपर की ओर जाती लालित्यपूर्ण वक्रताएं हैं। यह विमान तंजावुर के सीधे और साधारण विमान से भिन्न है। इसमें विशालाकार, एकाश्मिक द्वारपाल मूर्तियों के छह युग्म हैं जो प्रवेश द्वारों की रक्षा कर रहे हैं और अनूठी सुंदरता वाली कांसे की मूर्तियां भीतर की ओर हैं। दारासुरम में स्थित ऐरावतेश्वर मंदिर परिसर का निर्माण राजराजा-II ने करवाया था जिसमें 24 मीटर ऊंचा विमान और शिव की एक पाषाण प्रतिमा है। ये मंदिर वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला और कांसे की ढलाई के क्षेत्र में चोलों की उत्कृष्ट उपलब्धियों के गवाह हैं।

प्रवेश शुल्‍क:-
प्रवेश नि:शुल्क है।
हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों से की जाने वाली स्टिल फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी के लिए कोई शुल्क नहीं है। अन्य सभी प्रकार की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण, चेन्नई मंडल, चेन्नई-9 से संपर्क किया जा सकता है। (फोन-044-25670396/25670397)

खुलने का समय : सभी दिन सुबह 6.30 से सायं 8.30 तक

पहुंच मार्ग: तंजावुर चेन्नई से लगभग 330 कि.मी. दूर है और यहॉं रेल और सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है।

बृहदीश्वर मंदिर, गंगईकोंडाचोलपुरम, जिला पेरम्बलूर

महान चोल शासक, राजराजा-I (985-1014 ई.) के यशस्वी पुत्र, राजेन्द्र-I (1012-1044 ई.) ने इस स्थान का चुनाव संभवत: 11वीं सदी के प्रथम चौथाई काल के दौरान चोल साम्राज्य के लिए एक नई और विशाल राजधानी बनाने के लिए किया था ताकि उत्तरी क्षेत्रों पर अपनी विजय स्‍मृति को ताजा रख सके। फिर भी उसने न केवल एक नगर का निर्माण किया जिसके अब खंडहर बचे हैं और जिसकी आंशिक रूप से खुदाई हुई है, बल्कि उसने शिव के एक विशाल मंदिर का भी निर्माण करवाया। तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर ने इस मंदिर को विन्यास की व्यापक परिकल्पना और ऊंचाई के विशाल अनुपात में अनेक प्रकार से प्रभावित किया।

विन्यास- अपनी अक्षीय इकाइयों सहित गर्भगृह, चंडीकेश्वर मंदिर, अनुषंगी मंदिरों सहित छत्ता मंडप और एक गोपुर तंजावुर की भांति है। दो छोटे धार्मिक स्थलों- दक्षिण और उत्तर कैलाश (अब अम्मान मंदिर) की अवस्थिति भिन्न हैं। किन्तु इस इमारत के वास्‍तुविद् ने तंजावुर के बृहदीश्वर के डिजाइन में रही कमियों को इसमें ठीक कर लेने की उल्‍लेखनीय बद्धिमत्‍ता दिखाई है। जैसे कि मंदिर की चिनाई में एक लकड़ी की मचान खड़ी करने के लिए प्रावधान करना, उपयुक्त परिवर्तन द्वारा मनोहारी उठान और ‘हार’ अवयवों की स्थापना करना आदि।

मंदिर में दिए गए दान को सही-सही अभिलेखबद्घ करने वाला अभिलेख यहां नहीं है। वास्तव में राजेन्द्र का स्वयं का यहां कोई अभिलेख नहीं है। आरंभिक या सबसे पहला अभिलेख उसके पुत्र का है किन्तु इसमें उसके पिता द्वारा किए गए दान को अभिलेखबद्घ किया गया है

इस मंदिर में नृत्य करते गणेश, अर्धनारी, दक्षिणमूर्ति, हरिहर, अदावल्लान (नटराज) (दक्षिणी भित्ति के आलों में), गंगाधर, लिंगोद्भव, विष्णु, सुब्रह्मण्य, विष्णु अनुग्रहमूर्ति (पश्चिमी भित्ति) कालांतकमूर्ति, दुर्गा, ब्रह्मा, भैरव, कामांतक (उत्तरी भित्ति) जैसी असाधारण उत्कृष्टता वाली मूर्तियां हैं। किन्तु यहां सर्वाधिक उल्लेखनीय मूर्तियां उत्तरी प्रवेश मार्ग से मंदिर की ओर जाती सीढि़यों के पार्श्व में बने आलों में पाई गई हैं। ये मूर्तियां, चंदेसानुग्रहमूर्ति और सरस्वती की मूर्तियां हैं। कांसे की भोगशक्ति और सुब्रह्मण्य की मूर्तियां चोल काल की धातु से बनी सर्वोत्कृष्ट मूर्तियां हैं। आठ देवी-देवताओं सहित सौर पीठ (सौर वेदी), कमल वेदी, बहुत ही शुभ मानी जाती है।

19वीं सदी में एक ब्रिटिश अधिकारी ने इस मंदिर को कोल्लीडेम नदी पर एक छोटे बांध का निर्माण करने के लिए पत्थर प्राप्त करने का सर्वोत्म साधन माना और इसलिए उसने इस मंदिर को गिराने का आदेश दे दिया। किन्तु स्थानीय लोगों के विरोध के कारण यह मंदिर गिराया नहीं जा सका।

प्रवेश शुल्‍क:
प्रवेश नि:शुल्क है।
हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों द्वारा की जाने वाली स्टिल फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी के लिए कोई शुल्क नहीं है। फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के अन्य सभी प्रकारों के लिए अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण, चेन्नई मंडल, चेन्नई-9 से संपर्क करें (फोन 044-25670396/25670379)

खुलने का समय: सभी दिन प्रात: 6.30 बजे से रात 8.30 बजे तक

पहुंचने का मार्ग:- गंगईकोंडाचोलपुरम कुम्भकोणम को जाने वाली सड़क पर चेन्नई से लगभग 250 किमी. की दूरी पर है और कुंभकोणम चेन्नई से रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

ऐरावतेश्वर मंदिर, दारासुरम, जिला, तंजावुर
चोल राजा राजराजा-II (1143-1173 ई.) द्वारा निर्मित यह मंदिर चोल वास्तुकला का रत्‍न है। हालांकि तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर तथा गंगईकोंडाचोलपुरम मंदिर की तुलना में बहुत ही छोटा यह मंदिर सबसे अलग है क्योंकि यह अत्यधिक अलंकृत संरचना है। इस मंदिर में एक गर्भगृह है जिसमें प्रदक्षिणा पथ और अक्षीय मंडप नहीं हैं। अभिलेखों के अनुसार राजगंभिरन/तिरूमंडपम के नाम से जाना जोने वाला सामने का मंडप अनोखा है क्योंकि इसकी संकल्पना पहिए वाले रथ के रूप में की गई थी। इस मंडप के स्तंभ अतिशय अलंकृत हैं। वास्तुकला को और अधिक निखारने वाले मूर्तिशिल्प के साथ सभी इकाइयों के उठान रमणीय हैं।

इस मंदिर की विभिन्न भाव-भंगिमाओं में ऋषि पत्नियों के साथ भिक्षाटन की समस्त मूर्तियों जैसी अनेक मूर्तियां अब तंजावुर कला दीर्घा में परिरक्षित हैं। ये चोल कला की श्रेष्ठ कृतियां हैं। नागराज, अगस्त्य, नृत्य करते हुए मार्तण्ड, भैरव, सरभमूर्ति, गणेश आदि जैसी शेष मूर्तियां भी समान रूप से मनोहारी हैं। 63 नयनमारों (शैव संतों) के साथ घटित प्रसंगों का गुणगान करने वाली घटनाओं से संबंधित लघु चित्रवल्लरियां उल्लेखनीय हैं और इस क्षेत्र में शैववाद की गहरी आस्था को प्रतिबिंबित करती हैं। वास्तव में, राजा इस मंदिर में तमिल में लिखे शैव धार्मिक ग्रंथ, थिवरम से भजन गाने के लिए दान देता था।

मुख्य मंदिर के कुछ समय बाद बने देवी के अलग मंदिर के निर्माण से दक्षिण भारतीय मंदिर परिसर के एक अनिवार्य घटक के रूप में अम्मन मंदिर के आविर्भाव का पता चलता है।

प्रवेश शुल्‍क: प्रवेश नि:शुल्क है।

हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों द्वारा की जाने वाली स्टिल फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी के लिए कोई शुल्क नहीं है। अन्य सभी प्रकार की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण, चेन्नई मंडल, चेन्नई-9 से संपर्क करें (फोन 044-25670396/25670379)

खुलने का समय: सभी दिन प्रात: 6.30 बजे से रात 8.30 बजे तक।

पहुंच मार्ग: दारासुरम कुम्भकोणम का उपनगर है और यह चैन्नई से लगभग 290 किलो मीटर दूर है और यहां से रेल एवं सड़क से दारासुरम पहुंचा जा सकता है

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